मेघ आए कविता का सारांश और भावार्थ

 मेघ आए कविता का सारांश (megh aaye poem summary in hindi)

मेघ आए कविता का सारांश और भावार्थ
मेघ आए कविता का सारांश और भावार्थ 

मेघ आए कविता में मेघों के आने की तुलना सज कर आए प्रवासी या अतिथि (दामाद) से की है। ग्रामीण संस्कृति में दामाद के आने पर उल्लास का जो वातावरण बनता है इसी के आधार पर मेघों के आने का वर्णन करते हुए कवि ने उसी उल्लास को इस कविता में दिखाया है।
    कवि ने मेघों की तुलना सज कर आए अतिथि यानी दामाद से करते हुए कहा है कि मेघ शहर से आए अतिथि की भांति सज धज कर आए हैं। जिस तरह मेहमान के आने पर गांव के लड़के-लड़कियां भाग कर सबको इसकी सूचना देते हैं ठीक उसी तरह मेघ के आने की सूचना देने के लिए हवा तेज गति से बहने लगी है मेहमान को देखने के लिए हवा तेज गति से बहने लगी है। मेहमान को देखने के लिए जिस तरह लोग खिड़की दरवाजों से झांकतें हैं ठीक उसी तरह मेघों के दर्शन के लिए भी लोग उत्सुकता पूर्वक खिड़की दरवाजों से बाहर आकाश के तरफ देखने लगते हैं। इस तरह छोटे बड़े काले भूरे सफेद रंग के मेघ अपने दलबल के साथ आकाश में ऐसे छा गए हैं मानों कोई शहरी मेहमान सज धज कर गांव में आया हो।
      जिस तरह मेहमान के आने पर गांव के वृद्ध व्यक्ति आगे आकर और हाथ जोड़कर अतिथि का आदर सत्कार करते हैं तथा पत्नी दीवार की ओट लेकर देखती है उसी तरह आकाश में बादलों की छा जाने पर आंधी चल ने लगती है तथा आंधी के चलने के कारण बूढ़े पीपल के पेड़ की डालियां झुकने लगी और उससे लिपटी लता में भी हरकत होने लगी।
      जैसे मेहमान (दमाद) के आने से पत्नी के चेहरे पर छाई उदासी दूर हो जाती है और उनके चेहरों में  चमक आ जाता है दोनों का मिलन हो जाने के बाद खुशी के कारण दोनों की आंखों से जिस तरह झर-झर आंसू बहने लगते हैं वैसे ही आकाश में या आसमान में बादल या मेघ एक दूसरे से मिलते हैं तो दोनों के मिलन से बिजली चमकने लगती है और मेघों के आपस में टकराने से वर्षा शुरू हो हो जाती है इस प्रकार मूसलाधार बारिश ने सबके मन को शांत और तृप्त कर देता हैं।
कवि ने इस कविता के माध्यम से मानवीकरण अलंकार का प्रयोग करते हुए प्रकृति का एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत किया है।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जीवन परिचय

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को हुआ। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर दयाल थे उनका शिक्षा भी बस्ती जिला के उत्तर प्रदेश में ही हुआ। यह बचपन से ही विद्रोही प्रकृति के थे। इलाहाबाद से उन्होंने बीए और सन् 1949 में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की सन 1964 में  अज्ञेय जीके निवेदन से दिल्ली आकर दिनमान पत्रिका से जुड़े। अज्ञेय जी के साथ में काफी कुछ। 1982 मेरे प्रमुख बाल पत्रिका पराग के संपादक बने। इसी बीच उनकी पत्नी विमला देवी का निधन हो गया। उन्होंने नाटक, कहानी, उपन्यास, कविता इत्यादि लिखें। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक रचनाएं किए जिनमें है- एक सूनी नाव, गर्म हवाएं, जंगल का दर्द, पागल कुत्तों का मसीहा, मंहगू की टाई,(बाल नाटक), बकरी (नाटक)। उन्होंने नेपाली कविताएं शीर्षक से एक काव्य संग्रह का भी संपादन किया। उन्होंने यात्रा स्मरण भी लिखें। जो कुछ रंग कुछ गंध नाम से छपकर आया है।  उनके कविता संग्रह छुट्टियों पर टांगे लोग,पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला 23 सितंबर 1983 को नई दिल्ली में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का निधन हो गया। 

megh aaye poem meaning in hindi

मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के।


संदर्भ:- प्रस्तुत काव्यांश 'मेघ आए' कविता से है जिसके कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी है ।

प्रसंग:- प्रस्तुत अंश में मेघ की तुलना शहरी मेहमान से की है। ग्रामीण संस्कृति में दामाद के आने पर जो हंसी-खुशी का माहौल आता है उसी उसको मेघ रूपी शहरी मेहमान के आने को दर्शाया गया है।

भावार्थ :- 
           इसमें कवि कहते हैं कि बादल बहुत तैयारी के साथ बड़े बन ठन कर साज सवार कर आकाश रूपी ससुराल में आए हैं उनके स्वागत में हवा आगे-आगे नाचती गाती हुई चल रही है जैसे किसी अतिथि के आने पर खुशी का वातावरण बन जाता है उसी प्रकार मेघ रूपी मेहमान के आने पर सभी लोग खुश होकर अपने दरवाजे और खिड़कियां खोल खोल कर देख रहे हैं कवि आगे कहते हैं ये जो बादल रूपी मेहमान आए हैं वे कोई साधारण मेहमान नहीं है बल्कि दूर रहने वाले दामाद की तरह बहुत दिनों के बाद आए हैं। शहरी मेहमान के समान सज सवार कर आए हुए बादल बहुत ही सुंदर और सुखद प्रतीत हो रहे हैं।

विशेष:- 
१.कवि प्रकृति प्रेमी है वे बादल की तुलना मेहमान से किया है।
२. ग्रामीण क्षेत्र में आए किसी अतिथि के आने पर जो खुशी होती है उनको बतलाने की कोशिश की है।
३. भाषा साधारण बोलचाल की है।
४. यहां कवि ने बहुत ही सुंदर तरीके से मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया है ।


पेड़ झुक झांकने लगे गरदन उचकाए
आंधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए
बाकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूंघट सरके।
मेघ आए बड़े बन ठन के सँवर के।

संदर्भ :- प्रस्तुत काव्यांश मेघ आए कविता से ली गई है जिसके कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी है।

प्रसंग :- शहरी मेहमान के आने से सभी बहुत ज्यादा खुश हैं गांव में उसके कदम रखते ही ग्रामीण इलाके के सभी लोग उन्हें किस प्रकार से स्वागत करते हैं इसका व्याख्यान इस पंक्ति में किया गया है।

भावार्थ :- 

इस पंक्ति के माध्यम से कवि कहते हैं कि जिस प्रकार मेघ के आने पर आंधियां चलने लगती है आंधियों के तेजी से चलने से पेड़ पौधे कभी झुकते कभी उठते हैं धूल भी दूर-दूर तक फैले लगती है और नदियों में भी हलचल होने लगती है ठीक उसी प्रकार शहरी मेहमान के आने पर गांव के सभी लोग उस दमाद को देखने के लिए कभी अपनी गर्दन झुकाते हैं तो कभी उठाकर देखते हैं और कुंवारी युवतियां भी उस दमाद को देखकर बहुत ज्यादा खुशी से झूम उठती है और अपनी घाघरा उठा कर सूचना देने के लिए दौड़ पड़ती है। गांव की दुल्हन भी उस नए मेहमान को देखने के लिए थोड़ी सी अपनी घुंघट उठाकर तिरछी नजर से देखने लगती है। ताकि उन्हें उस दमाद की एक झलक उन्हें मिल जाए। कवी आगे कहते हैं कि जिस प्रकार से मेघ के‌ आने से सभी तरफ हलचल मच जाती है ठीक उसी प्रकार शहरी मेहमान यानी कि दामाद के आने पर सभी ओर हलचल मची हुई है।

विशेष:-

१.कवि प्रकृति प्रेमी है वे बादल की तुलना मेहमान से किया है।
२. कवि ने यहां पेड़ की तुलना गांव से, धूल की तुलना कुंवारी लड़की से तथा नदी की तुलना गांव की दुल्हन से की है।
३. भाषा साधारण बोलचाल की है।
४. कवि ने बहुत ही सुंदर तरीके से मानव और प्रकृति का संबंध स्थापित किया है जिसके कारण यहां मानवीकरण अलंकार  है ।


बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की,
बरस बाद सुधि लीन्हीं-
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की,
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।
मेघ आए बड़े बन ठन के संवर के।

संदर्भ :- प्रस्तुत काव्यांश मेघ आए कविता से ली गई है जिसके कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी है।

प्रसंग: मेघ रूपी मेहमान के आने से पूरा गांव खुश है और सम्पूर्ण रीति रिवाज के साथ मेघ रूपी मेहमान का स्वागत किया जाता रहा है इसी का उल्लेख इस पंक्ति में किया गया है।

भावार्थ :- 
प्रस्तुत पंक्ति के द्वारा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी कहते हैं कि जिस प्रकार शादी के बाद पहली बार दामाद के आने पर गांव के बूढ़े बुजुर्ग सबसे पहले उनका स्वागत करते हैं ठीक उसी प्रकार मेघरूपी मेहमान के आने पर सबसे पहले बुजुर्ग या बूढ़े पीपल आगे बढ़कर मेघों का स्वागत करते हैं। बरसों बाद दामाद गांव आए हैं जिसके कारण उनकी पत्नी उनसे नाराज हैं गुस्सा है क्योंकि इतने दिनों के बीच एक बार भी उनकी हाल खबर या सुधि नहीं ली और अब दर्शन दिए हैं जिसके कारण से वे बाहर नहीं आती है और किवाड़ की आड़ से ही उन्हें झांक कर देखने लगती हैं कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार से वर्षा सालों बाद होती है पेड़ों पर लगे लताएं वर्षा होने का इंतजार करते ही रहती है इतने दिनों के बाद वर्षा आने के कारण लाताएं मेघों से इतरा रही है और पेड़ों के पीछे से ही उन्हें नज़रें चुरा कर देख रही है। आगे कवि कहते हैं कि मेहमान रूपी मेघ को देख कर तालाब बहुत ज्यादा खुश हैं और मेहमान के पैरों को धोने के लिए तालाब परात में पानी भरकर लाया है क्योंकि वर्षा न होने के कारण जो तालाब का पानी सूख रहा था अब वह तालाब फिर से मेघ के आने पर भर जाएगा। 

विशेष: -
१. इस पंक्ति में मानवीकरण अलंकार है बूढ़े पीपल, लताएं, ताल जो मानव जीवन से परिचित कराते हैं।
२. इस पंक्ति में भारतीय रीति-रिवाजों, भारतीय स्वागत सत्कार के बारे में बताया गया है कि जिस प्रकार किसी अतिथि के आने पर उनके सम्मान के लिए पैरों को धोकर बड़े बुजुर्ग उनका स्वागत करते हैं ठीक उसी प्रकार मेघ रूपी मेहमान को भी रीति-रिवाजों से स्वागत किया जा रहा है।
३. कवि ने यहां बूढ़े बुजुर्ग की तुलना पीपल से की है क्योंकि पीपल का पेड़ बहुत सालों तक जीवित रहते हैं। तथा लता की तुलना पत्नी से और तालाब की तुलना परिजनों से की है।

क्षितिज अटारी गहराई दामिनी दमकी,
‘क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की’,
बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

संदर्भ :- प्रस्तुत काव्यांश मेघ आए कविता से ली गई है जिसके कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी है।

प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति में बहुत समय के बाद सब्र का जो बांध था वह अब बारिश के साथ खत्म होने के बारे में बताया है साथ ही प्रेमी और प्रेमिका की मिलन से जो खुशी होती हैं उनकी आंखों से बहने वाली आंसुओं से व्यक्त किया है।

भावार्थ:
प्रस्तुत पंक्ति सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिखित कविता मेघ आए कविता से ली गई है कवि कहते है  कि मेघ रूपी मेहमान के आने का सब्र का बांध अब टूट चुका है। मेघ रूपी मेहमान क्षितिज रूपी अटारी पर अब पहुंच चुके हैं यानी कि मेघ या काले बादल अब पूरे बादल में छा चुके हैं। और आकाश से भी उनके आने की रोनक बिजली की चमक से पता चल रहा है। अब तो प्रेमिका और प्रेमी का मिलना संभव है। इस बात से सभी मेघ से क्षमा मांगते हुए कहते हैं कि तुम्हारे आने और ना आने का जो शंका थी वह अब खत्म हो चुकी है। साथ ही प्रेमिका का भ्रम भी मेघ रूपी मेहमान (दामाद) को सामने देख कर टूट चुका है और वियोग के बाद फिर से संयोग या फिर से एक बार मिलने की खुशी से दोनों की आंखों से आंसू निकल आते हैं और उनके आंसू के साथ ही झर-झर बारिश शुरू हो जाती है।

विशेष:
१. इस पंक्ति में मानवीकरण अलंकार के साथ-साथ रूपक अलंकार भी हैं।
२. सब्र के बाद पुनः एक बार फिर से मेघ का आने खुश झलकती है।
३. प्रेमी-प्रेमिका के मिलने की जो खुशी होती है उसे गर्मी के बाद पहली बारिश से जोड़ा गया है।


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