किशोरावस्था की परिभाषा। समस्याएं। किशोरावस्था की आवश्यकताएं


दोस्तों आज का लेख सीटेट और b.ed जैसे विद्यार्थियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है आज का टॉपिक है - kishoravastha आज हम किशोरावस्था की परिभाषा, किशोरावस्था की समस्याएं, किशोरावस्था को तूफान का काल क्यों कहा जाता है, किशोरावस्था के शारीरिक विकास, किशोरावस्था के मानसिक विकास, किशोरावस्था के संवेगात्मक विकास, किशोरावस्था में सामाजिक विकास भी अनेकों विषय के बारे में पढ़ेंगे।

किशोरावस्था (Kishoravastha)

किशोरावस्था विकास तथा समायोजन का वह समय है जो बचपन से शुरू होता है और प्रौढ़ावस्था में लीन हो जाता है इस काल में बचपन समाप्त हो जाता है और परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होती है वास्तव में यह समय परिवर्तन का समय ही है।

Kishoravastha - किशोरावस्था की समस्याएं। किशोरावस्था की आवश्यकताएं
 Kishoravastha

किशोरावस्था की परिभाषा:-

किशोरावस्था की शाब्दिक परिभाषा :- 

शब्द Adolescence शब्द Adolescere से निकला है जिसका अर्थ है फलना फूलना अथवा प्रौढ़ होना।

जीव विज्ञान तथा कालक्रम के अनुसार परिभाषा :-

 जीव विज्ञान के दृष्टिकोण से किशोरावस्था व समय हैं जब यौवन आरंभ होता होता है कार्यक्रम के अनुसार वह जीवन का वह भाग है जो 12 वर्ष से 17 19 वें वर्ष तक होता है जिसमें निजी तथा सांस्कृतिक अंतर होते हैं ।

कोहलन के अनुसार किशोरावस्था की परिभाषा:-

"किशोरावस्था वह काल है जिसकी विशेषताएं हैं लिंगी सामाजिक, व्यवसायिक, आदर्श संबंधित समायोजन और माता-पिता पर निर्भरता से मुक्ति प्राप्त करने का चेष्टा।"

स्टैनले हाल के अनुसार किशोरावस्था की परिभाषा  : - 

"किशोरावस्था बहुत दबाव तथा तनाव और तूफान तथा संघर्ष का समय होता है।"

 

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किशोरावस्था की समस्याएं

किशोरावस्था की समस्याएं बहुत ही जटिल समस्याएं हैं किशोरावस्था व्यक्ति के जीवन की अत्यंत विकासशील अवस्था होती है इस अवस्था में व्यक्ति का शारीरिक मानसिक और सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे अपने परिवार तथा समाज के साथ नया समायोजन स्थापित करना पड़ता है किशोरावस्था की समस्याएं की या समायोजन की समस्याएं प्रमुख रूप से निम्नलिखित हैं -

 

शारीरिक वृद्धि का समायोजन की समस्याएं -

किशोरावस्था में व्यक्ति के शरीर में तेजी से असंतुलित रूप से परिवर्तन होने लगता है उसकी लंबाई उसके भार तथा शरीर के अन्य अंगों में भी तेज तथा असंतुलित वृद्धि होने लगता है जिसके परिणाम स्वरूप वह लोगों में बेचैनी अनुभव करने लगता है उसे अनुभव होता है कि अपने सहपाठियों की संगति में वह विचित्र सा लग रहा है उसकी इन स्थाई शारीरिक विकास के कारण अध्यापक तथा माता-पिता को उसे या बैल आदि नहीं कहना चाहिए।

             लड़कियों को बेचैन आज शांत निराशा चिड़चिड़ी मानसिक रूप से व्यवस्थित एवं असंतुलित करने वाले शारीरिक तत्व होने लगते हैं मोटापा लंबा चेहरे का आकार पतलापन झुरिया सामान्य शारीरिक आकृति चेहरे पर तिल इत्यादि

लड़कों को बेचैन करने वाले शारीरिक तत्व लंबाई चौड़ाई में अनुपात का आभाव चेहरे का अमान्य आकार कंधों की चौड़ाई रीड की हड्डी का टेढ़ापन असंतुलित शारीरिक विकास आदि

     किशोरावस्था में हो रही थी शारीरिक वृद्धि के अनुकूल किशोर को पौष्टिक भोजन दिया जाना चाहिए क्योंकि किशोरों में शारीरिक शक्ति अत्याधिक होती है इसलिए उसके स्वच्छ प्रयोग के लिए स्वस्थ साधन जुटाए जाने चाहिए जैसे खेल स्केटिंग सामाजिक सेवा तथा अन्य मनोरंजन कार्य।

 

मानसिक स्पर्धा का समायोजन की समस्याएं:-

मानसिक विकास के कारण किशोर हर बात में दोस्त ढूंढने लगता है वास्तव में वह प्रत्येक संबंधित वस्तुएं का ज्ञान प्राप्त करके अपने मानसिक क्षेत्रों को विस्तृत करना चाहता है जिन किशोरों का मानसिक विकास अपेक्षाकृत श्रेष्ठ होता है उन्हें समायोजन की समस्या का सामना इसलिए करना पड़ता है क्योंकि उनके माता-पिता तथा अध्यापक उन्हें अत्यंत कठिन प्रतिस्पर्धा स्थिति में डाल देते हैं और जिन किशोरों का मानसिक विकास धीमी गति से होता है उन्हें समायोजन की समस्या का सामना इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि उन्हें लगता है कि स्कूल का वातावरण केवल प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए विषयों में निपुणता प्राप्त करना कठिन है।

    किशोरों का मानसिक विकास सुनिश्चित करनी है के लिए पाठ्यक्रम व्यक्ति पर आधारित होना चाहिए पाठ्य सहायक क्रियाओं की व्यवस्था होनी चाहिए उन्हें पढ़ने की आदत विकसित करनी चाहिए और उन्हें पुस्तकालय संबंधी प्रवृतियां प्रदान की जानी चाहिए।

 

भावात्मक बेचैनी के प्रति समायोजन की समस्या :-

शारीरिक ढांचे में हो रहे परिवर्तनों स्नायु मंडल तथा ग्रन्थि संस्थान की सामान्य क्रियाओं तथा बढ़ते हुए सामाजिक अनुभव के कारण किशोरों किशोरियों में भावात्मक बेचैनी उत्पन्न हो जाती है उनकी भावात्मक कभी-कभी अपनी सीमा भी पार कर जाते हैं उनका मन उत्साह और उत्तेजित के बीच रहती हैं एक्शन में उनका उत्साह उच्चतम शिखर को पहुंच जाता है और दूसरे क्षण उदासी छा जाती हैं यहां तक कि कभी-कभी तो मैं आत्महत्या की बात सोचने लगते हैं कभी आंसू कभी मुस्कुराहटें कभी स्वार्थ हीनता कभी आत्मविश्वास कभी आत्मा हीनता कभी उत्साह कभी उपेक्षा किशोरावस्था की सामान्य विशेषताएं हैं।

      आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भावात्मक नियंत्रण में सहायता दी जाए किशोरों से व्यवहार करते हुए हमें उनकी वैयक्तिकता का सम्मान करना चाहिए।

 

परिवारिक समायोजन की समस्याएं :-

कभी-कभी किशोर अपने परिवारिक स्थितियों में अपने आप को नहीं डाल सकता परिवारिक समायोजन की समस्या इसलिए उत्पन्न होती है कि किशोर की आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं परंतु उसके माता-पिता उसके स्वतंत्र व्यवहार का विरोध करते हैं इसी से कठिनाई उत्पन्न हो जाती हैं ऐसी अनुभव करने लगता है जैसे माता-पिता उसे बंधन में रखना चाहते हो कई बार किशोर नकारात्मक अभिवृत्ति अपना लेते हैं बात बात पर माता-पिता से झगड़ना उनकी आलोचना करना उन्हें नीचा दिखाने का प्रयत्न करना ऐसी समस्या उत्पन्न होती है।

 

माता पिता के प्रति किशोरों की कुछ प्रतिक्रिया इस प्रकार होती हैं-

=> मेरे माता-पिता मुझ में जो दोष निकालते हैं मुझे विश्वास है कि दोष मुझ में नहीं है।

 

=> जब भी मैं कोई बात कहता हूं मेरे पिता जी मुझ पर चुभता हुआ व्यंग कर देते हैं इसलिए आप मैं कोई भी बात कहने से डरता हूं।

इसके अतिरिक्त विवाह समस्या व्यवसाय के चुनाव तथा सामाजिक दर्शन के कारण भी किशोरों के मन में संघर्ष उत्पन्न हो सकता है के माता-पिता अपने छोटे आयु में विवाह करने के लिए विवश करके उनका जीवन नष्ट कर देते हैं विवाह के संबंध में किशोरों किशोरियों के विचारों को महत्व देना चाहिए बच्चों को अध्ययन के लिए पर्याप्त स्वतंत्र देना चाहिए माता-पिता को बच्चों से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार अपनाना चाहिए और उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता देनी चाहिए।

 

मित्रों के प्रति समायोजन की समस्या :-

किशोरावस्था में लड़कों तथा लड़कियों को कुछ ऐसे मित्रों की आवश्यकता होती है जिन पर वे पूर्ण विश्वास कर सकें और जिनके साथ में स्वतंत्र पूर्वक विचार विमर्श कर सकें लड़कियों की मैत्री लड़कों की अपेक्षा संवेगात्मक होती हैं लड़कों में दोस्त बनाने की प्रवृत्ति सबसे अधिक पाई जाती हैं दोस्तों के साथ घूमना फिरना उनका फितरत है। लड़कियों में सच्ची सहेलियां बढ़ाने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम होती हैं। 

Kishoravastha - किशोरावस्था की समस्याएं। किशोरावस्था की आवश्यकताएं
 Kishoravastha

लैंगिक समायोजन की समस्याएं :-

किशोरावस्था में लैंगिक जीवन की तेजी की वृद्धि होती हैं आकर्षण अधिक होता है कई कारणों से वे चिंतित और बेचैन होते हैं उनमें कई प्रकार के डर उत्पन्न हो जाते हैं।

 

औषध व्यसन :-

किशोर ऐसे समूह के सदस्य बनते हैं यहां औषध उपयोग प्रयोगात्मक एवं मनोरंजन आधार पर शुरू किया जाता है आज मद्यपान एवं धूम्रपान किशोरों का स्थिति चीह्न बन गए है।

 

समाज के साथ समायोजन करने की समस्या :-

कुछ किशोरों को सामाजिक समायोजन की समस्या का भी सामना करना पड़ता है यह समस्या समाज में विद्यमान मूल्यों से संबंधित होती हैं किशोर और रीति-रिवाजों तथा परंपराओं को नहीं मानना चाहते जो पौराणिक होते हैं वह नवीन और नए रिवाजों में डालना चाहते हैं उन्हें पुरानी नीति बिल्कुल भी पसंद नहीं आते हैं वह अपने युग की एक स्वतंत्र समाजवादी व्यक्ति हैं उन्हें समाज से कोई लेन-देन भी नहीं होती। वे खुद से वे खुद ही जीते हैं उनके कामों में कोई दखल अंदाज करें तो उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं होता जो भी करते हैं उन्हें सही लगता है अगर उनके कामों पर कोई त्रुटियां निकाली जाए तो नहीं अच्छा नहीं लगता कि उन्हें समझाएं तो उन्हें बेकार लगता है इसलिए बड़ों की बातें उन्हें चुभती है।


किशोरावस्था की आवश्यकताएं

किशोरावस्था शारीरिक तथा संवेगात्मक गड़बड़ी के कारण जीवन की अत्यंत कोमल अवस्था होती है इसने किशोरावस्था के बालक बालिकाओं को कुछ बुनियादी आवश्यकताओं द्वारा उत्पन्न होने वाले विभिन्न कठिनाइयों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ता है उनके कुछ आवश्यकता है इस प्रकार है-

निर्भरता से स्वतंत्रता की आवश्यकता :-

किशोरावस्था के बच्चे अपने आप को पूर्ण प्रौढ़ समझते हैं इसलिए वह नियंत्रण में रहना नहीं चाहते मैं अपना मत प्रकट करने के लिए स्वतंत्रता की आवश्यकता अनुभव करते हैं इस इच्छा के कारण कठिनाइयां उत्पन्न हो जाती है माता-पिता तथा अध्यापकों को चाहिए कि वे उन्हें पूर्ण व्यक्ति समझे तथा उन्हें स्वतंत्रता तथा उत्तरदायित्व दे।

 

विरोधी लिंग में आकर्षण :-

इस काल में विरोधी लिंग के प्रति आकर्षण अधिक होता है। विरोधी लिंग को मोहित करने के लिए अपने शरीर का श्रृंगार करते हैं। विरोधी लिंग में अधिक रूचि लेते हैं।

 

आत्मनिर्भरता की आवश्यकता :-

आत्मनिर्भरता से भाव है कि वे अपने जीवन में जो चाहे कर सके। इस आवश्यकता की पूर्ति शिक्षा तथा व्यवसाय से संबंधित निर्देशन देकर की जा सकती है उनके पाठ्यपुस्तक के ऐसी हो जिनमें उनका रुझान हो तथा वे रुचि ले सके।

 

जीवन दर्शन की आवश्यकता :-

किशोरावस्था में बच्चे मानसिक तौर पर प्रौढ़ होते हैं इसलिए जीवन की प्रतिक्रिया के बारे में उनका दृष्टिकोण स्वतंत्र होता है वे धार्मिक मामलों में रुचि लेते हैं उनका विषय दर्शनशास्त्र की चर्चा करना ही नहीं बल्कि आचरण, धर्म तथा भविष्य के बारे में वार्तालाप करना भी होता है अध्यापकों तथा माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वह उनकी इस आवश्यकता को पूरा करें तथा धर्म शिक्षा और नैतिक प्रशिक्षण पर बल दे नहीं तो माता-पिता तथा बच्चों के मध्य झगड़ा उठ खड़ा होगा।

 

सुरक्षा की आवश्यकता (need for security) :-

किशोरावस्था के बालक माता-पिता के सहारे के बिना कष्ट उठाते हैं। बच्चों से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना चाहिए ताकि वे निराशाओं तथा समस्याओं से बच सके।

 

मान्यताएं एवं आत्म पहचान की आवश्यकता need for acceptance and self recognition):-

किशोरों में आत्मा अवधारणा आत्मसम्मान आत्मा प्रतिष्ठा एवं मान्यता की तीव्र भावना होती है वह परिवार साथी समूह स्कूल तथा समाज में एक मान्य व्यक्ति की स्थिति चाहते हैं। वे चाहती हैं कि परिवार में उनके सुझावों को ध्यान में रखा जाए महत्वपूर्ण पारिवारिक विषयों एवं निर्णयों में उनकी सलाह ली जाए स्कूल में सहपाठी अध्यापक उन्हें पहचाने तथा जिम्मेदारी के कार्य सौंपें। किशोर आत्मा चेतन होते हैं। उनमें दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने की तीव्र इच्छा होती है विपत्ति क्षेत्र में अपने आप को अभिव्यक्त करना चाहते हैं। इसके पीछे आत्म-पहचान का संवेग काम करता है। आता माता पिता और अध्यापकों का कर्तव्य है कि वह इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखें।

 

अच्छी खुराक की आवश्यकता (need for better food) :-

 किशोरावस्था तीव्र विकास का समय है। शरीर लंबा होता है भार बढ़ता है और शरीर हर प्रकार से वृद्धि करता है। इसलिए जीवन के दूसरे चरणों की अपेक्षा इस चरण पर अधिक अच्छी एवं संतुलित खुराक की आवश्यकता है। माता-पिता अध्यापकों तथा शिक्षा शास्त्रियों का यह कर्तव्य है कि वह देखेगी बच्चों को सही तथा पौष्टिक भोजन की उचित मात्रा उचित समय पर मिलनी चाहिए भोजन का गुणकारी होना भी आवश्यक है।

 

नए अनुभवों की आवश्यकता (desire for new experiences) :-

किशोरावस्था में 12 कटिंग को पसंद नहीं करते। विनय से नए अनुभव में रुचि लेते हैं। उनकी इस इच्छा की संतुष्टि पर्यटन या ट्रिप सैर सपाटे एक्सरसाइज तथा स्कूल में पाठ्यक्रम संबंधित क्रियाओं द्वारा की जा सकती है।

 

 स्वग्राही होने की आवश्यकता (need for self Assertive) :-

किशोर में स्वग्राही होने की आवश्यकता होती हैं स्वग्राही होने से उन्हें अपने कामों पर मन लगता है और वे खुद से भी सीखते हैं जैसे कि उन्हें चाहे जितना भी समझाया जाए चाहे उन्हें अच्छी बातें सिखाया जाए उन्हें अच्छा नहीं लगता पर जब वह गलती करके खुद से सीखते हैं और कुछ अच्छा ग्रहण करते हैं तो उन्हें अपने माता-पिता या अभिभावक के बातें याद आती है और वे अपने माता-पिता को भी समझ पाते हैं इसलिए उनके जीवन में किसी भी प्रकार का दखल अंदाज नहीं करना चाहिए ताकि वे स्वयं से अच्छी बातें सीखे क्योंकि यह उम्र इतनी होती है कि वह किसी की बातों को भी नहीं सुनना चाहते जब उन्हें समझाया जाता है तो उनके अंदर एक चीड़चिड़ापन और दूसरों की बातों में विश्वास नहीं करने की शक्ति होती है खुद पर विश्वास और भरोसा करते हैं। वे किसी पर निर्भर नहीं होना चाहते हैं। इसलिए उन्हें स्वग्राही होने की आवश्यकता है।

 

उपलब्धि एवं सफलता की आवश्यकता (need for achievement and success) :-

प्रत्येक किशोर उपलब्धि एवं सफलता प्राप्त करके श्रेष्ठ बनना चाहता है इसमें समाज में उसके उपयुक्त समायोजन की संभावना बढ़ जाती हैं इसका एक कारण यह है कि वह कई समूहों की सदस्यता ग्रहण करते हैं तथा उनकी क्रियाओं एवं समारोहों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं उपलब्धियों सफलताओं से उनकी अंतः क्रिया में वृद्धि होती हैं इससे उनकी संबंधता की आवश्यकता संतुष्टि होती है तथा उनकी आकांक्षा स्तर में वृद्धि होती हैं। अध्यापकों स्कूल में भिन्न भिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं सहित अनेक क्रियाओं का आयोजन करना चाहिए।

 

किशोरावस्था में शारीरिक विकास

क्रो एवं क्रो के अनुसार

१. भार :-

किशोरावस्था में बालकों का भार बालिकाओं से अधिक बढ़ता है। इस अवस्था के अंत में बालकों का भार बालिकाओं से लगभग 25 पाउंड अधिक होता है।

 

२. लंबाई :-

इस अवस्था में बालक और बालिकाओं के लंबाई बहुत तेजी से बढ़ती रहती हैं बालिका की लंबाई 18 वर्ष तक और उनके बाद भी बढ़ती रहती हैं बलिका अपने अधिकतम लंबाई पर लगभग 16 वर्ष की आयु में पहुंच जाती हैं।

 

३. सिर व मस्तिष्क

इस अवस्था में सिर और मस्तिष्क का विकास जारी रहता है 15 या 16 वर्ष की आयु में सिरका लगभग पूर्ण विकास हो जाता है एवं मस्तिष्क का भार 1200 और 1400 ग्राम के बीच में होता है।

 

४. हड्डियां:-

इस अवस्था में अस्थीकरण की प्रक्रिया समाप्त हो जाती हैं हड्डियों में पूरी मजबूती आ जाती हैं और कुछ छोटी हड्डियों एक दूसरे से जुड़ जाती है।

 

५. दांत

इस अवस्था में प्रवेश करने के समय बालको और बालिकाओं के लगभग सब स्थाई दांत निकल आते हैं। यदि उनके प्रष्तादांत निकलने होते हैं तो वे इस अवस्था के अंत में या प्रौढ़ावस्था के आरंभ में निकलते हैं।

 

६. अन्य अंग :-

इस अवस्था में मांस पेशियों का विकास तीव्र गति से होता है। 12 वर्ष की आयु में मांसपेशियों का भार कुल शरीर के भार का लगभग 33% और 16 वर्ष की आयु में 44% होता है हृदय की धड़कन में निरंतर कमी होती जाती है। जिस समय बालक प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करता है उस समय उसके हृदय की धड़कन 1 मिनट में 72 बार होती हैं।

 

किशोरावस्था में मानसिक विकास

वुडवर्थ :-

 "मानसिक विकास 15 से 20 वर्ष की आयु में अपनी उच्चतम सीमा पर पहुंच जाता है।"

 

बुद्धि का अधिकतम विकास :-

किशोरावस्था में बुद्धि का अधिकतम विकास हो जाता है या विकास हरमोहन के अनुसार 15 वर्ष में जॉन्स एवं कोनार्ड के अनुसार 16 वर्ष में और स्पीयर मैन के अनुसार 14 से 16 वर्ष के बीच में होता है।

 

मानसिक स्वतंत्रता

किशोर के मानसिक विकास का एक मुख्य लक्षण है मानसिक स्वतंत्रता रूढ़ियों रीति-रिवाजों अंधविश्वासों और पुरानी परंपराओं को अस्वीकार करके स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने का प्रयास करता है।

 

Kishoravastha - किशोरावस्था की समस्याएं। किशोरावस्था की आवश्यकताएं
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मानसिक योग्यता

किशोर की मानसिक योग्यता का स्वरूप निश्चित हो जाता है उसमें सोचने समझने विचार करनी अंतर करने समस्या का समाधान करने की योग्यताएं उत्पन्न हो जाती है

 एलिस क्रो के अनुसार - " किशोर में उच्च मानसिक योग्यताओं का प्रयोग करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है पर वह प्रौढ़ों के समान उनका प्रयोग नहीं कर पाता है।


ध्यान

 किशोरों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता का पर्याप्त विकास हो जाता है। वह किसी विषय या वस्तु पर अपने ध्यान को बहुत देर तक केंद्रित सकता है।

 

चिंतन शक्ति

किशोर में चिंतन करने की शक्ति होती है इसकी सहायता से वह विभिन्न प्रश्नों और समस्याओं का हल खोजता है पर उसके हल साधारण था गलत होते हैं। इसका कारण बताते हुए एलिस क्रो ने लिखा है - "किशोर का चिंतन बहुधा शक्तिशाली पक्षपातों और पूर्व निर्णय से प्रभावित रहता है।"

 

तर्कशक्ति

किशोर में तर्क करने की शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है तर्क के बिना वह किसी बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं  होता है।

 

कल्पना शक्ति

किशोर वास्तविक जगत में रहते हुए भी कल्पना के संसार में विचरण करता है कल्पना के बहुल्य के कारण उसमें दिवा -स्वप्न देखने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती हैं कुछ किशोर अपनी कल्पना शक्ति को कला, संगीत, साहित्य और रचनात्मक कार्यों द्वारा व्यक्त करते हैं। बालकों की अपेक्षा बालिकाओं में कल्पना शक्ति अधिक होती हैं।

 

रूचियों की विविधता

किशोरावस्था में रोगियों का विकास बहुत तीव्र गति से होता है बाल को और बड़े गांव में कुछ रोगियों समान और कुछ भी भिन्न होती है जैसे

=> समान रुचियां :- भावी जीवन और भावी व्यवसाय में रुचि सिनेमा देखने, रेडियो सुनने, गाने सुनने वीडियो गेम खेलने और प्रेम साहित्य पढ़ने में रुचि।

 

=> विभिन्न रुचियां :- बालकों में स्वास्थ्य बनने और बालिकाओं में सुंदर बनने की रुचि बालकों की खेलकूद और बालिकाओं की संगीत नृत्य नाटक आदि में रुचि बालक और बालिकाओं की एक दूसरे में रुचि।

 

किशोरावस्था में सामाजिक विकास

क्रो एवं क्रो :-

जब बालक 13 या 14 वर्ष की आयु में प्रवेश करता करता है। तब उसके प्रति दूसरों के और दूसरों के प्रति उसके कुछ दृष्टिकोण न केवल उसके अनुभव में वरन उसके सामाजिक संबंधों में भी परिवर्तन करने लगते हैं। इस परिवर्तन के कारण उसके सामाजिक विकास का स्वरूप निम्नलिखित होता है-

१. बाल को और बड़ी गांव में एक दूसरे के प्रति बहुत आकर्षण उत्पन्न हो जाता है अपनी सर्वोत्तम वेशभूषा तनाव श्रृंगार और सज धज में अपनी को एक दूसरे के समक्ष उपस्थित करते हैं।

 

२. बालक और बालिकाएं दोनों अपने-अपने समूह का निर्माण करते हैं। इस समूह का मुख्य उद्देश्य होता है- मनोरंजन जैसे पर्यटन, पिकनिक, नृत्य, संगीत, बातचीत इत्यादि

 

३.कुछ बालक और बालिका ने किसी भी समूह के सदस्य नहीं बनते हैं वे उनसे अलग करा कर अपने या विभिन्न लिंग के व्यक्ति से घनिष्ठता स्थापित कर लेते हैं और उसी के साथ अपना समय व्यतीत करते हैं।

 

४. बालकों में अपने समूह के प्रति अत्यधिक भक्ति होती हैं। वे उसके द्वारा स्वीकृत वेशभूषा आचार विचार व्यवहार आदि को अपना आदर्श बनाते हैं।

 

५. समूह की सदस्यता के कारण उनमें नेतृत्व, उत्साह, सहानुभूति, सद्भावना, आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है। साथ ही उनकी आदतों, रुचियां और जीवन दर्शन का निर्माण होता है।

 

६. इस अवस्था में बालक और बालिकाओं का अपने माता पिता से किसी ना किसी बात पर संघर्ष या मतभेद हो जाता है। यदि माता पिता उनकी स्वतंत्रता का दामन करके उनके जीवन को अपने आदेशों के सांचे में ढालने का प्रयत्न करते हैं या उनके समक्ष नैतिक आदर्श प्रस्तुत करते हैं, तो नए खोल में विद्रोह की भावना उत्पन्न होती हैं।

 

७. किशोर बालक अपने भावी व्यवसाय का चुनाव करने के लिए सदैव चिंतित रहते हैं। इस कार्य में उनकी सफलता या असफलता उसकी सामाजिक विकास को निश्चित रूप से प्रभावित करता है।

 

८. किशोर बालक और बालिकाएं सदैव किसी ना किसी चिंता यह समस्या में उलझे रहते हैं जैसे धन, प्रेम, विवाह, कक्षा में प्रगति, पारिवारिक जीवन इत्यादि। इस समय से उनकी सामाजिक विकास की गति को तीव्र या मन्द उचित या अनुचित दिशा प्रदान करती हैं।

 

किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास

कॉल एंव ब्रूस :-

"किशोरावस्था के आगमन का मुख्य चीह्न संवेगात्मक विकास में तीव्र परिवर्तन है।"

 

१. किशोर में प्रेम, दया, क्रोध, सहानुभूति आदि साबित स्थाई रूप धारण कर लेते हैं। वहीं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। अत: वह साधारणतया अन्यायी व्यक्ति के प्रति क्रोध और दुखी व्यक्ति के प्रति दया की अभिव्यक्ति करता है।

 

२. किशोर की शारीरिक शक्ति की उसके संवेगो पर स्पष्ट छाप होती है उदाहरण सबल और स्वस्थ किशोर में सारे का तमाशा अस्थिरता पाई जाती हैं।

 

३. एलिस क्रो :- किशोर अनेक बातों के बारे में चिंतन रखता है उदाहरणार्थ उसे अपने आकृति, स्वास्थ्य, सम्मान, धन प्राप्ति, शैक्षिक प्रगति, सामाजिक सफलता और अपनी कमियों की सदु चिंतन करते रहता है।

 

४. क्रो एवं क्रो :- किशोर की ज्ञान रुचियां और इच्छाओं की वृद्धि के साथ सावे को को उत्पन्न करने वाले घटनाओं या परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाता है उदाहरणार्थ बाल्यावस्था में बाल विवाह जैसे सामाजिक कुरीति उसके लिए मनोरंजन का कारण हो सकती है पर किशोरावस्था में यही कुरीति उसके क्रोध को प्रज्ज्वलित कर सकती हैं।

 

५. किशोर ना तो बालक समझा जाता है और न प्रौढ़। अतः उसे अपने संवेगात्मक जीवन में वातावरण से अनुकूलन करने में बहुत कठिनाई होती है। यदि वह अपने प्रयास में असफल हो जाता है तो वह निराशा का शिकार बन जाता है। ऐसी दशा में वह या तो घर से भाग जाता है या आत्महत्या करने के बाद सोचता है।

 

६. बी.एन. झा - किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास कितना विचित्र होता है कि किशोर एक ही परिस्थिति में विभिन्न प्रकार का व्यवहार करता है जो परिस्थिति एक अवसर पर उसे उल्लास से भर देती हैं वही परिस्थिति क्रोध उत्पन्न कर दूसरे अवसर पर उत्पन्न कर देती हैं।

 

तो दोस्तों आज हमने इस लेख के माध्यम से kishoravastha  किशोरावस्था की परिभाषा, किशोरावस्था की समस्याएं, किशोरावस्था की आवश्यकताएं, किशोरावस्था की शारीरिक विकास, किशोरावस्था की मानसिक विकास और किशोरावस्था की सामाजिक विकास एवं किशोरावस्था की संवेगात्मक विकास के बारे में पढ़ा। उम्मीद है आप सभी को यह लेख पसंद आई होगी मुझे कुछ भी सुझाव देना चाहते हैं तो मुझे कमेंट करके बताइएगा और ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिएगा।


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