कबीर के दोहे क्लास 6 Solutions

कबीर (दोहे)

कबीर का संक्षिप्त जीवन परिचय

कबीर भक्ति काव्य धारा के संत कवि हैं इनका जन्म 1398 ईस्वी में हुआ था। कबीर सिकंदर लोदी के समकालीन कवि थे।

कबीर का जन्म उच्च कुल की विधवा के गर्भ से हुआ था। लेकिन उन्होंने अपने अपमान को छुपाते हुए उसने कबीर को लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। नीरू नामक जुलाहा और उनकी पत्नी नीमा उस तालाब के पास से कबीर को ले आए एवं उन का पालन पोषण करने लगे। कबीर के गुरु का नाम रामानंद था। कबीर ने लोई नामक एक स्त्री से शादी की थी उनके दो संतान भी हुए थे जिनका नाम कमल जो पुत्र था और पुत्री का नाम कमाली थी। कबीर अपने जीवन काल में कभी कलम नहीं पकड़ा कभी पढ़ा लिखा भी नहीं था वह अपनी वाणी में खुद भी कहते हैं 

मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गह्यै नहिं हाथ।

कबीर की रचनाओं का संकलन बीजक में है इसके संकलनकर्ता  धर्मदास है बीजक के तीन भाग है - साखी, सबद और रमैनी।

कबीर के समय में समाज में हर प्रकार के अंधविश्वासों, आडम्बरों, कुरीतियों एवं विभिन्न धर्मों का बोलबाला था। कबीर ने इन सब का विरोध करते हुए समाज को एक नवीन दिशा देने का पूरा प्रयास किया।इनके अलावा वे प्रेम की महत्ता को जानते थे इसलिए प्रेम को ऐसा कोड मानते थे जो स्वाद लाता है पर अपनी गुण को कह नहीं पाता।इनका प्रारंभिक जीवन काशी में बीता और मृत्यु मगहर में 1528 ई. में हुआ।


तिनका कबहुं न निन्दिए, जो पांयन तर होय।
कबहुंक उड़ि आंखिन परै, परि घनेरी होय।

व्याख्या :  कबीर कहते हैं कि एक छोटी सी तिनका कभी किसी के पैर में दब जाती है तो कभी अपनी निंदा नहीं करती पर जब वही छोटी सी तिनका आंख में पड़ जाती है तो आंख को बहुत ज्यादा पीड़ा पहुंचाती है।

कबिरा गर्व न कीजिए काल गहे कर केस
ना जानौं कित मारि है, क्या घर क्या परदेस।

व्याख्या :  कबीर कहते हैं कि  हे मनुष्य ! तू अपने आप पर क्या गर्व करता है? काल यानी की मृत्यु अपने हाथों में तेरे केश यानी बाल पकड़े हुए हैं  ।  पता नहीं, तुम्हें घर या परदेस पर यह किसी भी स्थान पर कब मार डालें एक कहा नहीं जा सकता।


अकथ कहाणी प्रेम की कछु कहीं न जाइ
 गूंगे केरी सरकरा, खावै अरुमुसकाई।

व्याख्या :  कबीर कहते हैं कि जिस प्रकार गूंगे व्यक्ति के पास अपनी कोई भाषा नहीं होती और जब वह मीठे का स्वाद ले लेता है, तब वह उस स्वाद की अभिव्यक्ति नहीं कर पाता और मुस्कुराते रहता है। उसके उसी मुस्कुराहट से मीठे स्वाद का पता चलता है। कभी कहते हैं कि ठीक यही स्थिति प्रेम की भी होती है|प्रेम में आपकी जुबान मौन हो जाती है और सिर्फ आपकी आँखे ही उस समय बोलती है | फिर कवि कहते हैं कि जो परमात्म भक्ति ईश्वर प्रेम का स्वाद चख लेता है तो फिर उसे और कोई सांसारिक पदार्थ उसे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता है। उनके अन्दर प्रेम रूपी मोदक या मीठा का स्वाद फुटते रहता है और वह उस प्रेम का स्वाद चखकर मुस्कुराते रहता है।


दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।

व्याख्या :  कबीर कहते हैं कि दुःख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख के समय सब ईश्वर को भूल जाते हैं। लेकिन कोई भी इंसान सुख में ईश्वर को याद नहीं करता यदि वह सुख में भी ईश्वर कोई याद करता तो उसके जीवन में कभी भी दुख आता ही नहीं। इसलिए कबीर कहते हैं कि इंसान को हर वक्त परमात्मा को याद करते रहना चाहिए तथा उन्हें हर बात के लिए धन्यवाद देते रहना चाहिए।


गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥  

व्याख्या :  कबीर ने इस दोहा के माध्यम से गुरु और शिष्य के बीच जो संबंध है उसे दर्शाने का प्रयास किया है। जिसमें गुरु को कुम्हार और शिष्य को घड़ा बताया है। जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाने से पहले मिट्टी को मार मार कर उसे मुलायम बनाता है फिर उसे अपने कोमल हाथों से  सहारा देते हुए एक अच्छा सा घड़े का आकार देता है ठीक उसी प्रकार गुरु भी बाहर से अपने शिष्यों को फटकारता है और अंदर से उनके चरित्रों को सुधारने का प्रयास करता है गुरु के अभाव में शिष्य एक माटी का अनगढ़ टुकड़ा ही होता है जिसे गुरु एक घड़े का आकार देते हैं, उसके चरित्र का निर्माण करते हैं।  


माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं।
मनुवा तो चहुँदिसि फिरै, यह ते सुमिरन नाहिं।।


व्याख्या :  कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने हाथ से माला फेरकर और जीभ से परमात्मा का नाम लेकर परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। क्योंकि उसका मानना है कि ऐसा केवल ढोंगी ही करते हैं क्योंकि हाथ में माला लेने से और मुंह से भगवान का नाम जपने से उसके मन शुद्ध नहीं होते उनके मन तो चारों दिशाओं में भटकते रहते हैं इसे भक्ति नहीं कहते हैं और ना ही ऐसा करने से परमात्मा की प्राप्ति हो सकता है। परमात्मा को प्राप्त करना है तो मन को पहले शांत करना होगा। तभी परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।


मौखिक प्रश्न

क) तिनके की निंदा क्यों नहीं करनी चाहिए?

उत्तर : तिनके की निंदा इसलिए नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक छोटी सी तिनका भी बहुत ज्यादा पीड़ा दे सकती है।


ख) केश पकड़कर कौन ले जाएगा?

उत्तर : केश पकड़कर काल ले जाएगा।


ग) 'सरकरा' के बारे में कौन कुछ नहीं बता सकता?

उत्तर : सरकरा के बारे में गंगा व्यक्ति नहीं बता सकता।


घ) माला कहां फेरी जाती हैं?

उत्तर : माला हाथों में फेरी जाती है।


लिखित प्रश्न

क) आज में तिनका पड़ जाने पर क्या होता है?

उत्तर : जब एक छोटी सी तिनका आंख में पड़ जाती है तो आंख को बहुत ज्यादा पीड़ा पहुंचाती है।


ख) 'काल' के विषय में कवि का क्या कहना है?

उत्तर : कबीर दास काल के विषय में कहते हैं कि काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए हैं मालूम नहीं वह घर या प्रदेश में कहां पर तुझे मार डाले किसी को कुछ भी नहीं पता।


ग) मनुष्य के हाथ में माला फिरती है और हृदय कहां फिरता है?

 उत्तर : मनुष्य के हाथ में माला फिरती हैं और हृदय चारों दिशाओं में फिरता है।


घ) दुख सुख में कबीर क्या अंतर मानते हैं?

उत्तर : सुख दुख में कबीर अंतर मानते हुए कहते हैं कि सुख के समय मनुष्य अपने जीवन की विडंबना में फंसे रहते हैं उन्हें ईश्वर या परमात्मा को याद करने तक के लिए समय नहीं होता।सुख में कोई भी इंसान परमात्मा को याद नहीं करता है पर जैसे ही उनमें दुख या विपत्ति आने लगता है तब वे परमात्मा को याद करने या स्मरण करने लगते हैं।


ड़) गुरु और शिष्य को कबीर ने किसके समान माना है और क्यों?

उत्तर : कबीर ने गुरु को कुम्हार और शिष्य को घड़ा के समान माना है क्योंकि जिस प्रकार एक कुम्हार मिट्टी को बाहर से मार-मार कर और अंदर से कोमल हाथों से सहलाते हुए एक सुंदर घड़े का आकृति देता है ठीक उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्य के अंदर बसे बुराइयों को मार मार कर दूर करता है और उनके अच्छे चरित्र का निर्माण करता है।


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