आदिकाल की विशेषताएं बताइए (aadikal ki pramukh pravritiyan)

आदिकाल की विशेषताएं बताइए (aadikal ki pramukh pravritiyan)

 
आदिकाल की विशेषताएं
आदिकाल की विशेषताएं

  हिन्दी साहित्य का इतिहास

हिन्दी साहित्य के इतिहास को तीन भागों में बांट गया हैं:-

(1) आदिकाल-प्रवृति के अन्तर्गत(विषयों)

(2) भक्तिकाल-विषयों की मुद्दा

(3) रीतिकाल

(4) आधुनिक काल

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 आदिकाल:- (1050-1375 के बीच) आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी के प्रथम काल को विरगाथा काल नाम दिया। उनका कहना हैं कि इस युग में आने वाली रचनाओं में अधिकांश विरगाथा काव्य हैं। उन्होंने जैनों द्वारा प्रस्तुत प्रचीन ग्रंथो को धामिर्क साहित्य बतला कर उनको रचनात्मक साहित्य क्षेत्र से बाहर कर दिया हैं।नायों और सिध्दों के साहित्य को उन्होंने शुध्द साहित्य माना हैं।शुक्ल जी के अनुसार इनसे किसी विशेष प्रकार की प्रविक्ति का निमार्ण नहीं हो पाता। अपने समय तक उपलब्ध ग्रंथों की प्रविक्तियों के आधार पर शुक्ल जी ने प्रथम काल का नाम विरगाथा काल रखा।

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                आदिकाल की  विशेषताएं (aadikal ki visheshtaye)

आदिकाल की सामान्य विशेषताओ को निम्न रूपों से समझ सकते हैं:-

(1) राष्ट्रीय भावना

(2) ऐतिहासिकता का अभाव

(3) जन जीवन के चित्ररत का अभाव

(4) डिंगल भाषा

(5) प्राकृतिक चित्रण

(6) रासों शब्द का प्रयोग

(7) युद्ध वर्णन में सजीवता 

(8) प्रामाणिकता में संकोच

(9) अनेक छंदों का प्रयोग

(10) वीर एवं श्रृंगार रस

(11) आश्रयदाताओं की प्रशंसा

(12) अलंकारों का समावेश

(1) राष्ट्रीय भावना- 

आदिकाल में राष्ट्रीयता की भावना अत्यन्त संकुचित थी।सौ पचास गांवों के साथ अपने राज्य को राष्ट्र समझने वाले राजाओं का अभाव नहीं था।समुच्य भारत को नहीं, बल्कि राज्य विशेष को ही राष्ट्र मन लिया जाता था।चरण कवि जिविका प्राप्ती हेतु अपने आश्रम दाता की झुठी प्रशंसा किया करता था। राजाओं का परस्पर संघर्ष ही राष्ट्रीय भावना के अभाव का घोतक है।


(2) ऐतिहासिकता का अभाव- 

वीरगाथाकाल की रचनाओं में ऐतिहासिकता का अभाव है।जो रचनाएं प्राप्त है, वे अधिकांश संदिग्ध है और उनमें प्रक्षिपत अंशों की अधिकता है।अपने आश्रम दाता ओ को प्रश्न रखने के लिए चरण काव्यों ने ऐतिहासिक तथ्यों की अवहेलना की है। कल्पना को अधिक प्रश्रय देने के कारण ही ऐतिहासिकता की और कवियों की दृष्टि विशेष रूप से नहीं रही।


(3) जन जीवन के चित्ररत का अभाव - 

चरण कवि अपने आश्रय दाताओ के गुण-गान मैं तल्लीन रहते थे ‌। उन्हें जन- जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं था। अतः जन जीवन सम्बन्धी काव्य में नहीं लिख पाए।


(4) डिंगल भाषा -

 इस काल की रचित प्राय: सभी रचनाएं डिंगल भाषा में है। डिंगल राजस्थान की साहित्यिक भाषा है।प्राय: ये सभी रचनाएं राजस्थान में रचि गयी। इसीलिए डिंगल भाषा में इनका लिखा जाना स्वाभाविक है।


(5) प्राकृतिक चित्रण-

 प्राकृतिक का चित्रण अलम्बन और उदीपन दोनों रूपों में किया गया है। नदियों, पर्वतों, नगर आदि का वर्णन सुंदर है। उदीपन रूप में प्राकृतिक का चित्रण अलम्बन की अपेक्षा अधिक सफल हुआ है।


(6) रासों शब्द का प्रयोग-

इस काल के रचना ग्रंथों के साथ रासो शब्द जुड़ा हुआ है। ये ग्रंथ रासों नाम से प्रसिद्ध है। कुछ विद्वान रासों शब्द की उत्पत्ति रहस्य से मानती है। फ्रांसीसी इतिहासकार गार्सा-द-तासी ने 'राज सूया' शब्द से इसकी उत्पत्ति मानी है।


(7) युद्ध वर्णन में सजीवता :

 रासो ग्रंथों में किये गये युद्ध वर्णन संजीव प्रतीत होते हैं। इन काव्य ग्रंथों में जहां-जहां युद्ध वर्णन के प्रसंग है वहां वहां ऐसा प्रतीत होता है जैसे कवि युद्ध का आंखों देखा हाल सुना रहा है। चारण कवि कलम की ही नहीं तलवार पर अपने अपने आश्रयदाता के साथ क्षेत्र में जाकर तलवार भी चलाते थे। युद्ध के दृश्यों को उन्होंने अपने आंखों से देखा था अतः इन युद्ध वर्णनों में जो कुछ भी कहा गया है उनकी अपनी वास्तविक अनुभूति हैं इन कवियों ने केवल सैन्य बल पर ही नहीं अपितु योद्धाओं की उमंगो मनोदशा एवं क्रियाकलापों का सुंदर वर्णन किया है निम्न कथा ध्यातव्य ‌ है "देश पर सब ओर से आक्रमण की संभावना थी निरंतर युद्ध के लिए प्रोत्साहित करने को भी 1 वर्ग आवश्यक हो गया था"

  ‌                                            हजारी प्रसाद द्विवेदी


(8) प्रामाणिकता में संकोच :- 

आदिकाल के अधिकांश रासो काव्य तथा कवियों की प्रमाणिकता में संकोचता है। पृथ्वीराज जो इस काल के प्रमुख रचना है वे भी पूर्ण रूप से प्रमाणित नहीं है इसी प्रकार खुमान रासो और परमाल रासो की प्रमाणिकता में भी संदेह हैं रासो काव्य समय-समय पर परिवर्तित एवं परिवर्धित होते रहे हैं। इस संबंध में निम्न कथा उल्लेखनीय है इसके अतिरिक्त और कुछ कहने की जगह नहीं है कि या पूरा ग्रंथ वास्तव में जाली है 

                                         - आचार्य रामचंद्र शुक्ल


(9) अनेक छंदों का प्रयोग :- 

रासो ग्रंथों में मी छंदों की विविधता परिलक्षित होती है। छंदों की यह विविधता हिंदी के न तो परवर्ती साहित्य में मिलती हैं न पूर्वर्ती साहित्य में। पृथ्वीराज रासो में अनेक शब्दों का प्रयोग हुआ है यथा: दोहा, गाथा, तोमथ, रोला, उल्लाला, कुंडलियां आदि। यह छंद परिवर्तन मात्रा कलात्मक क्या चमत्कार प्रदर्शन के लिए न होकर भाव प्रकाशन के लिए किया गया है। परमाल रासो खुमान रासो तथा अन्य रचनाओं में भी छंदों का वैविध्य देखा जा सकता है 


(10) वीर एवं श्रृंगार रस :-

 आदिकाल में वीर एवं श्रृंगार रस के अलावा सभी रस का प्रयोग हुआ है। युद्ध का वर्णन होने से वीर रस की योजना इन में अनायास ही हो गई है। वीरों के मनोभाव एवं अदम्य उत्साह का जैसा हृदय ग्राही वर्णन रासो काव्य में किया गया है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पृथ्वीराज रासो में ऐसे अनेक मर्म स्पर्शी स्थल है जहां वीर रस का पूर्व परिपाक हुआ है। कुछ शौर्य प्रदर्शन के लिए तथा सुंदर राजकुमारियों से विवाह करने के निमित्त लड़े जाते थे। इस कारण श्रृंगार रस के भावपूर्ण वर्णनों का समावेश भी इन काव्य ग्रंथों में हो गया है। राजकुमारियों की सौंदर्य अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन नासिक परिपाटी पर किया गया है वीरगाथात्मकता इस काल की प्रधान प्रवृत्ति है यह अधिकांशतः रासो काव्य के अंतर्गत मिलती है।

                                     विश्वनाथ त्रिपाठी


(11) आश्रयदाताओं की प्रशंसा :- 

रासों ग्रंथों के रचिता चरण कहे जाते थे और अपने आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा में काव्य रचना करना अपना परम कर्तव्य मानते थे। अपने चरित्र नायक की श्रेष्ठता एवं प्रति पक्षी राजा की हीनता का वर्णन अतिशयोक्ति में करना इन चारणों की प्रमुख विशेषता थी। दरबारी कवि होने के कारण इन कवियों ने आश्रय दाता शौर्य यश वैभव का कल्पनिक एवं अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन किया है। पृथ्वीराज रासो एवं खुमान रासो इसी कोटि की प्रशंसा परक रचनाएं है जिनमें कवि ने अपने चरित्र नायक को राम कृष्णा युधिष्ठिर अर्जुन और हरिश्चंद्र से भी श्रेष्ठ बताते हुए प्रत्येक दृष्टि से उनकी महत्ता प्रतिपादित की है। निम्न में कथा उल्लेखनीय है "उस समय तो जो भार या चारण किसी राजा के पराक्रम विजय आदि का चित्रण करता था वही सम्मान पाता था। 

                                                   आचार्य रामचंद्र शुक्ल


(12) अलंकारों का समावेश : 

आदिकाल में अलंकारों का समावेश हुआ है। चारण कवियों ने अपने काव्य में अलंकारों का सहारा लिया है। उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा का जैसा हृदय ग्राही चित्रण इन काव्य प्रांतों में मिलता है वैसा आयंत्र दुर्लभ है। सुंदर चित्रण में उत्प्रेक्षा ओं से काम लिया गया है यद्यपि रासो की विशाल ग्रंथ में प्राय: सभी अलंकार खोजने से प्राप्त हो जाते हैं तथापि अनुप्रास, वक्रोक्ति, यामक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति जैसे अलंकारों की प्रधानता रही है इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कोई भी अलंकार ऐसा नहीं जो उनमें ना फबता हो कोई भी छंद ऐसा नहीं जो उसका साथ ना देता हो।     

                                                 रामगोपाल शर्मा दिनेश।


निष्कर्ष

इस प्रकार आदिकालीन काव्य अपनी विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण है। कहते की दृष्टि से आदिकालीन साहित्य में एक साथ कई परंपराओं का उदय दिखाई देता है। अब रन और संस्कृत की रचनाओं में इनमें से कुछ परंपराओं के स्रोत अवश्य है किंतु उनकी शक्ति और गंभीरता हिंदी की अपनी देन है। समाज के विभिन्न स्थितियों पर दृष्टिपात करके सहज जीवन का मार्ग सुलझाने से लेकर हट योग की साधना तक आदिकाल में मुक्तक काव्य का जो विस्तार हुआ निश्चय ही उसका पर्याप्त ऐतिहासिक महत्व है वीरगाथा काल का विषय प्रधान रूप से राजाओं का यशोगान था। आदिकाल के कवियों ने उपयुक्त विषयों को ध्यान में रखते हुए अपनी रचनाएं की है। वीरगाथा कालीन रचनाओं का महत्त्व साहित्यिक सौंदर्य की दृष्टि से बहुत नहीं है। इनका महत्व विशेष रूप से भाव विकास के अध्ययन की दृष्टि से है। इनसे हमारे साहित्य के मूल रूप को समझने में सहायता मिलती है।

aadikal ki pramukh pravritiyan                                        


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