आदिकाल की परिस्थितियों का वर्णन करें

 आदिकाल की परिस्थितियां

वीरों की गाथाएं आदिकाल हिंदी साहित्य का केंद्र बिंदु हैं

      मासिक हंस अगस्त 2008
आदि से अंत तक चित्र वृत्तियों की परंपरा को पररखते वे साहित्य परंपरा के साथ सामंजस्य दिखलाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है।
         आचार्य रामचंद्र शुक्ल
साहित्य मानव समाज के विविध भाव एवं नित नवीन रहने वाली चेतना की अभिव्यक्ति है किसी काल विशेष के साहित्य की जानकारी से तद्युगीन मानव समाज को समग्रता आ जाना जा सकता है दूसरे शब्दों में किसी काल विशेष के साहित्य में पाई जाने वाली प्रवृतियां तत्कालीन परिस्थितियों के सापेक्ष होती है। आदिकालीन साहित्य के प्रेरक तत्व के रूप में इसकी परिस्थितियों का महत्वपूर्ण योगदान है किसी भी काल के साहित्य के इतिहास को समझने के लिए उस काल विशेष की परिस्थितियों को समझना आवश्यक होता है। आदिकालीन साहित्य की जो प्रमुख विशेषताएं हैं वे  तद्युगीन परिस्थितियों से विकसित हुई है इस काल की परिस्थितियों का आकलन निम्न शिर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है -
१ राजनीतिक परिस्थिति
२. धार्मिक परिस्थिति
३. सांस्कृतिक परिस्थिति
४. सामाजिक परिस्थिति
५. साहित्यिक परिस्थिति
६. कलाओं की स्थिति

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१ आदिकाल की राजनीतिक परिस्थिति(aadikal ki rajnitik paristhiti)  :- 

राजनीतिक दृष्टि से यह युद्ध और अशांति का काल था। सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के उपरांत उत्तर भारत खंड राज्यों में विभाजित हो गया था।
      चौहान और चंदेल वंश के राजपूत राजाओं ने अपने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे। राजपूत राजा निरंतर युद्ध की आग में जलते जलते अंतत: शक्ति क्षीर्ण हो गए थे और विदेशी आक्रांताओं का डटकर मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थे। भारत के उत्तर पश्चिमी सीमा पर विदेशी आक्रमणों का भय बराबर बना रहता था। 10 वीं शताब्दी में सभी महमूद गजनबी ने और 12 वीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी ने भारत को पदाक्रांत किया जनता विदेशी आक्रमणों से त्रस्त थी ही साथ ही साथ युद्ध गामी देसी राजाओं के अत्याचारों को भी सहन करने की विवर्स थी धीरे-धीरे समस्त हिंदी प्रदेश में स्थित राज्यों दिल्ली कनोज अजमेर आदि पर मुसलमानों का अधिकार हो गया- "इस कार का समस्त हिंदी साहित्य आक्रमण और युद्ध के प्रभावों की मन: स्थितियों का प्रतिफल है।"
                  डॉक्टर रामगोपाल शर्मा दिनेश

२. आदिकाल की धार्मिक परिस्थिति :-

आदिकाल में तीन  संप्रदायों का विशेष प्रभाव दिखाई देता है
i सिद्ध संप्रदाय
ii नाथ संप्रदाय
iii जैन संप्रदाय
इस काल में वैदिक और पौराणिक धर्म के विभिन्न रूपों के साथ जैन और बौद्ध धर्म भी अपने वास्तविक आदर्शों से हट गए बौद्ध धर्म में पर्याप्त परिवर्तन हो चुका था बौद्ध में मूर्ति पूजा योग भक्ति का समावेश होने लगा। काला नंतर में तंत्र मंत्र जादू टोनी मांस मदिरा आदि ने स्थान पा लिया। धर्म के वास्तविक आदर्शों के स्थान पर इस काल में खत्म हो चुके थे लोग आश्चार्य विहीनता चमत्कार प्रदर्शन एवं भोग विलास को विशेष महत्व देते थे। सिध्द संप्रदाय निम्न वर्ग की अशिक्षित जनता पर अपना प्रभाव छोड़ने के लिए तंत्र मंत्र,जादू टोना एवं चमत्कार प्रदर्शन द्वारा अशिक्षित जनता पर अपना प्रभाव जमा रहे थे। इस काल में विभिन्न धर्मों के मूल रूप लुप्त हो चले थे और उनमें अंधविश्वास का समावेश हो गया था।
हिमालय के पाक देश में प्रचलित नाथ पूजा बौद्ध धर्म को प्रभावित करके ब्रज यान शाखा के नाम से प्रसिद्ध हो चुकी थी
  आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

३. आदिकाल की सांस्कृतिक परिस्थिति :- 

सम्राट हर्षवर्धन के समय भारत सांस्कृतिक दृष्टि से अपने शिखर पर था हिंदू धर्म एवं संस्कृति राष्ट्रव्यापी एकता का आधार था किंतु कालांतर में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन से भारत धीरे-धीरे मुस्लिम संस्कृति से भी प्रभावित होता गया। इसका पूरा पूरा फायदा मुस्लिम संस्कृति के लोग उठाने लगे और वे भारतीय संस्कृति के मूल केंद्रों जैसे मंदिरों, मठों एवं विद्यालयों को नष्ट करने का प्रयास किया। मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव आदिकाल के हिंदू संस्कृति के अनेक क्षेत्रों में पड़ने लगा था या कहना असंगत न होगा कि आदिकालीन भारतीय संस्कृति परंपरा से विच्छिण होकर मुस्लिम संस्कृति के गहरे प्रभाव को स्वीकार करती जा रही थी।
हाथी कान में भारतीय संस्कृति का जो स्वरूप मिलता है वह परंपरागत गौरव से विच्छिण तथा मुस्लिम संस्कृति के गहरे प्रभाव से निर्मित है।
          रामगोपाल शर्मा दिनेश।

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४. आदिकाल की सामाजिक परिस्थिति (aadikal ki samajik paristhiti): -

जिस युग में धर्म और राजनीति की दशा दीन हीन हो उसमें उच्च सामाजिकता की आशा नहीं की जा सकती। जनता शासन तथा धर्म दोनों और से निराश्रित होती जा रही थी। सामान्य जनता अशिक्षित थी जो साधु सन्यासी शापों और दानों की ओर दृष्टि लगाए रहते थी। समाज में स्त्रियों के प्रति पूज्य भाव नहीं था। वे मात्रा योग्य बनकर रह गई थी। सती प्रथा भी इस काल का एक भयंकर कोढ़ था। तत्कालीन भारत में स्वयंवर प्रथा भी थी जो पराया युद्ध का कारण बन जाती थी। सुंदर राजकुमारियों से बलपूर्वक विवाह करने के लिए राजपूतों में युद्ध छिड़ जाना एक सामान्य बात हो गई थी। राजा और सामंत अंत:मुखी रंगरलियां में व्यस्त रहते थे। पूजा पाठ तंत्र मंत्र और जब तक करके लोग महामारी एवं युद्ध के संकटों को डालना चाहते थे। वर्ण व्यवस्था के प्रति लोगों में सम्मान नहीं रहा गया था।

५. आदिकाल की साहित्यिक परिस्थिति:- 

आदिकाल में साहित्य रचना की तीन धाराएं बह रही थी -
i. परंपरागत संस्कृत साहित्य की रचना
ii. प्राकृत, अपभ्रंश भाषा साहित्य का सृजन जैन कवियों कर रहे थे।
iii. हिंदी में लिखे जाने वाले साहित्य
इस काल में संस्कृत साहित्य के अंतर्गत पुराणों एवं स्मृतियों पर टिकाए लिखी गई ज्योतिष एवं काव्यशास्त्र पर अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की गई। आनंद वर्धन, मम्मट, एवं श्री हर्ष जैसी प्रतिभाएं इसी युग की देन है। स्वयंभू, पुप्षदांत, धनपाल हेमचंद्र जैसे जैन कवियों ने भी जो साहित्य प्रस्तुत किया है वह अपनी मौलिकता एवं साहित्यिता के कारण उच्च कोटि का है चरण कवियों की सामायिक आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया है उस समय तो जो भट्ट या चरण किसी राजा के पराक्रम विजय की व्याख्या करता था वही सम्मान पाता था।
         आचार्य रामचंद्र शुक्ला

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६. आदिकाल में कलाओं की स्थिति: - 

इस काल में हिंदुओं की स्थापत्य कला धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत थी तथा अत्यंत उच्च कोटि की थी। संपूर्ण भारत में ऐसे अनेक मंदिरों का निर्माण आदि काल में ही हुआ। आबू का जैन मंदिर पूरी भुनेश्वर कांची आदि के मंदिर इसी काल  की देन है। हिंदू संगीत कला वस्तु आयुर्वेद एवं गणित का प्रभाव मुस्लिम संस्कृति पर पड़ने लगा। संगीत चित्र मूर्ति स्थापत्य आदि कलाओं में जातीय गौरव की भावना अभिव्यक्त हो रही थी जहां तक मूर्तिकला का प्रश्न है। मुस्लिम शासक मूर्ति पूजा के विरोधी थे। आदिकाल के आरंभ तक निर्मित अधिकांश मूर्तियों धर्म से प्रभावित थी।। इस्लामी शासन की स्थापना से मूर्ति कला को धक्का लगा चित्रकला के क्षेत्र में जो थोड़ा बहुत कार्य हुआ उस पर भी मुस्लिम प्रभाव पाया जाता है। इस संबंध में उल्लेखनीय हैं- वे(हिंदू) कला के अत्यंत उच्च सोपान पर आरोहण कर चुके हैं हमारे लोग (मुसलमान) जब उन्हें (मंदिरों को) देखते हैं तो आश्चर्यचकित रह जाते हैं
  ‌‌   ‌अलबरूनी

निष्कर्ष

यदि विचार पूर्वक देखा जाए तो आदिकालीन हिंदी साहित्य में भाव और भाषा शैली की दृष्टि से जो विविधता दिखाई देती है उसका मूल कारण तत्कालीन परिस्थितियां है इन्हीं तत्कालीन राजनीतिक सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक साहित्यिक परिस्थितियों के माध्य आदिकालीन साहित्य की रचना हुई है। आदिकाल में जहां एक ओर राजनीतिक हलचल के कारण भारत अशांत था वही दूसरी ओर धर्म अपने मूल उद्देश्य से भटक गए या सांस्कृतिक दृष्टि से उत्कर्ष का योग था। साहित्य में अनेक वीरगाथात्मक रचनाएं सामने आई। हिंदी साहित्य के आदिकाल में जो साहित्य मिलता है वह अधिकांश था अपभ्रंश या शुद्ध हिंदी का नहीं इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं
  आदिकाल का हिंदी साहित्य आने बोलियों का साहित्य प्रतीत होता है यह काल हनी दृष्टि ओं से संधि काल है
डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी

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