पुस्तक की उपयोगिता पर निबंध (pustak ki upyogita par nibandh)

पुस्तकों की उपयोगिता पर निबंध


                अंधकार  है वहां  जहां  आदित्य नहीं है 

                 मुरदा है वह देश , जहां साहित्य नहीं है  ।

      उक्त पंक्तियां स्वत : ही पुस्तकों की उपयोगिता को प्रमाणित  कर देती है । ' पुस्तक' अर्थात , ज्ञान का भण्डार' । आज के वैज्ञानिक युग ने जहां मनुष्य को सुख - सुविधाओं से सम्पन्न किया वहीं उसे ज्ञान का भण्डार' कम्प्यूटर ' भी प्रदान  किया । इसमें जीवन की समस्त जानकारियां  उपलब्ध रहती हैं और कुछ ही क्षण में मनुष्य  देश- विदेश के समाचारों को प्राप्त  कर लेते है । ज्ञान- विज्ञान साहित्य - संस्कृति । शैक्षिक- भौतिक सभी प्रकार की सुविधा कम्प्यूटर द्वारा   प्राप्त की जा सकती है। यही कारण है कि आज' पुस्तक की उपयोगिता'  पर एक प्रश्नचिह्न  लगाया जा रहा है ।  

        यह प्रश्न अपने- आप में अपनी  निरर्थकता तथा अप्रासंगिकता प्रमाणित करता है । क्योंकि किताबों का  संसार इतना विस्तृत है कि मनुष्य किसी भी विषय में सूक्ष्म जानकारी प्राप्त कर सकता है। यदि व्यक्ति किसी विषय में  ठोस और सम्पूर्ण ज्ञान  प्राप्त करना चाहता है तो उसे किताबों की दुनिया में प्रवेश करना  ही होगा क्योंकि कम्प्यूटर पर विषय से सम्बिधत  सीमित ज्ञान ही उपलब्ध  होता है । कोई भी व्यक्ति ' डांक्टर आंफ  लिटरेचर ' या अन्य कोई उपाधि बिना पुस्तकीय अध्ययन के  प्राप्त  नहीं कर सकता है । हम कह सकते है _ 


             "   ज्ञान का  अनुपम भण्डार हैं ये पुस्तकें,          

               लक्ष्य का सर्वोत्तम साधन हैं ये पुस्तकें,

              ऊंचाईयों को छूने का साधन  हैं ये पुस्तकें ,

             सच्चाई जानने का साधन हैं ये पुस्तकें।


      आज संसार में छल- कपट  भरा हुआ है। आज मनुष्य सर्वाथ के वशीभूत एक - दूसरे के साथ मित्रता करते हैं। सम्बन्ध बनाते हैं। व्यक्ति के सोचने का दृष्टिकोण संकुचित हो गया है। हर व्यक्ति एक - दूसरे का इस्तेमाल अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए कर रहा है। ऐसे भयावह काल में मनुष्य की सच्ची मित्र उसकी  पुस्तकें  होती है।  पुस्तकें उसका मार्ग दर्शन  करती हैं । आगे बढ़ने में उसकी सहायक होती हैं तथा उसे चिन्तन की एक नयी  दृष्टि देती हैं । प्रसिद्ध चितक ' रसेल ' ने कहा था कि" यदि तुम सच्चे और ईमानदार मित्र की तलाश में हो , तो पुस्तकें  पढ़ने की आदत डालो । पुस्तकों से अच्छा कोई साथी तुम्हें नहीं मिल सकता।" 

      ,    मनुस्मृति, में वर्णित   'जल प्लावन  ' की घटना  पुस्तक की उपयोगिता को स्वत: ही प्रमाणित कर देती हैं। जब सम्पूर्ण सृष्टि  जलमग्न  हो रही थी तब  सृष्टि बचा कर भी पशु- तुल्य जीवन व्यतीत करना पड़ता । वेदों में ही सभ्यता - संस्कृति , ज्ञान- विज्ञान का वह दिव्य प्रकाश सुरक्षित था जो नयी  सृष्टि को संचालित करने के लिए मार्गदर्शक बन  सकता था । अतः मनु के लिए जितना आवश्यक स्वंय को  बचाना था, उतना ही आवश्यक  ज्ञान की पुस्तकें- वेदों को बचाना था। 

       संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनके जीवन का चरित्र चित्रण का  यदि अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि वे सभी अच्छे पाठक भी थे। जीवन को जानने - समझने और कर्तव्य निश्चित करने के लिए  पुस्तकों का अध्ययन वे आवश्यक समझते थे । इस प्रकार पुस्तक मानव जीवन की उन्नति का मुख्य सूत्र  है। निराश और असहाय मानव जब संघर्ष से ऊबने, थकने और निराश होने लगता है तब अच्छी पुस्तकें उसे नव जीवन प्ररेणा देकर ऊर्जोवान बनाती हैं। पुस्तक अध्ययन के समय मनुष्य उसके रस सागर में अवगाहन करके अपने सभी सुख- दुःख भूल कर उसमें तादात्म्य स्थापित कर लेता है। इस प्रकार कह सकते है कि मानव  पुस्तक संसार में भृमण कर इहलोक  को भूल कर बृम्हानन्द  सरोवर में आनन्द  के सामन असीम  शांति और  आनन्द  प्राप्त कर सकता है और पुन: ऊर्जास्वित  होकर कर्म पथ पर अग्रसर हो सकता है। इस प्रकार पुस्तकें मानसिक क्षुधा को तृप्ति  प्रदान करने के साथ -  साथ  युग के साथ चलने में सहायक होती हैं। हम कह सकते हैं कि समाज के निविढ़  अन्धकार से आच्छादित मार्ग को पुस्तकें  आलोकित करती हैं और ज्ञान ज्योति के द्वारा समाज के मार्ग को निष्कंटक बना सकती हैं। 

      कोई भी मनुष्य किसी भी युग को जानना -  समझना , देखना - सुनना चाहता है तो उसे उस युग में रचित पुस्तकें पढ़नी होगी क्योंकि इतिहास हो या साहित्य । इनमें अपने युग की  छाया दिखाई देती हैं। मनुष्य जो देखता - सुनता , समझता और भोगता है वहीं शब्दों में उत्तर देता हैं । इतिहास में जहां यथार्थ के दर्शन होते हैं, साहित्य में वही मानवीय  भावनाओं और यथार्थ के संगम में अवगाहन किया जा सकता है। यही कारण है कि युद्ध के समय मनुष्य स्वंय को बचाने के साथ - साथ ज्ञान- भण्डार   पुस्तकालयों , संग्रहालयों आदि की सुरक्षा के लिए भी सचेष्ट रहता है। डॉ.  निर्मल वर्मा  _के अनुसार ," साहित्य और कुछ नहीं, उसकी प्रतिलोमित  छाया  है, जिसे  जिन्दगी पैदा करती है और ठुकरा कर फेंक देती हैं। " 'भर्तहरि '   

' पुंछविहीन  पशु ' के साथ उस मानव  समाज की तुलना करते हैं जहां साहित्य नहीं होता है - 

            "साहित्य - संगीत    लकाविहीन :  

             साक्षात पशु: पुच्छविषाणहीन : । "

निष्कर्ष 

उक्त  विवेचना से स्पष्ट है कि जीवन को समझने,उन्न्ति पर  अग्रसर करने, उसे नयी दृष्टि देने में पुस्तकों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। प्रत्येक  युग में पुस्तक की उपयोगिता रही हैं। आज कितने ही कम्प्यूटर क्यों न आ  जायें वे पुस्तक के महत्व को कम नहीं कर सकते हैं।

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