आदिकाल की समय अवधि/आदिकाल की समय सीमा क्या है

आदिकाल के सीमा अवधि के प्रश्न पर विद्वानों में मतभेद है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास नामक ग्रंथ में आरंभिक काल का समय संवत् 1050 से संवत् 1375 माना है। आचार्य शुक्ला ने आदिकाल की सीमा निर्धारित करते समय दसवीं शताब्दी से पूर्व के साहित्य अलग कर दिया था। शुक्ला जी मूंज और भोज के समय (संवत् 1050) से ही हिंदी का विकास मानते हैं। ऐसा मानते हुए वे आठवीं से दसवीं शताब्दी तक के सिद्ध जैन आदि कवियों के साहित्य को आदिकाल में सम्मिलित नहीं करते हैं। शुक्ला जी का यह मत पूर्वाग्रह से युक्त है। अतः इसे तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता।

    आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार 10वीं से 14वीं सदी तक के साहित्य को आदिकाल में शामिल करते हैं। द्विवेदी जी आदिकाल और उसकी भाषा का विवेचन करते हुए लिखते हैं कि 10 वीं -14वीं शताब्दी के उपलब्ध लोक भाषा साहित्य को अपभ्रंश से थोड़ा भिन्न भाषा का साहित्य कहा जा सकता है। वस्तुत: वह हिंदी की आधुनिक बोलियों में से किसी के रूप में ही उपलब्ध होता है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य इतिहास लेखक 10वीं शताब्दी से इस साहित्य का आरंभ स्वीकार करते हैं। इसी समय से हिंदी भाषा का आदि काल माना जा सकता है मिश्र बंधु, ग्रियर्सन, शिवसिंह सेंगार, आदि विद्वानों का भी यही मानना है।
       दूसरी ओर जब हिंदी के प्रथम कवि के रूप में सरहपाद को स्वीकार करते हुए आदिकाल की आरंभिक सीमा का निर्धारण करते हैं तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि द्वारा निर्धारित आरंभिक सीमा पर प्रश्नचिह्न उपस्थित हो जाता है। वही राहुल सांकृत्यायन में सरहपाद का समय 769 ई. माना गया है और इस आधार पर आदिकाल की पूर्व सीमा 769 ई. के लगभग किया गया है। यह सत्य है कि कोई भी साहित्यिक आंदोलन किसी एक दिन से अथवा तिथि विशेष आरंभ नहीं हो जाता। ऐसी स्थिति में 8वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध को आदिकाल के पूर्व सीमा माना जा सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल वीरगाथा काल की अंतिम सीमा संवत्  (1050-1375) निर्धारित करते हैं। डॉक्टर ग्रियर्सन ने इस काल की अंतिम सीमा सन् 1400 और मिश्र बंधुओं ने सन् 1387 इसमें निर्धारित की है। ग्रियर्सन तथा मिश्रा बंधुओं द्वारा किया गया यह सीमांकन उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि इस समय तक भक्ति काव्य का सूत्रपात हो चुका था। डॉ रामकुमार वर्मा ने शुक्ला जी के मत से सहमति प्रकट की हैं। जब रामाशंकर शुक्ल रसाल ने सन् 1343 ईस्वी को आदिकाल की आरंभिक सीमा मानी है। इस प्रकार आचार्य शुक्ल के दी हुई थी थी को स्वीकार करते हुए लगभग 2-3 दशक के समय तक आदिकाल के अंतिम सीमा माना जा सकता है क्योंकि जिस प्रकार कोई साहित्यिक विचारधारा अचानक आरंभ नहीं हो जाती उसी प्रकार अचानक लुप्त भी नहीं हो जाती। अतः मोटे रूप में आदिकाल के आरंभिक सीमा 8वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध तथा अंतिम सीमा 14 वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध मानी जानी चाहिए।

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