हिंदी साहित्य का इतिहास काल विभाजन एवं नामकरण hindi sahitya ke itihas ka kaal vibhajan

हिंदी साहित्य का काल विभाजन और नामकरण(hindi sahitya ka kal vibhajan aur namkaran) हिंदी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन और नामकरण पर प्रकाश डालिए 

साहित्य के अन्त:स्थल में युग युग से विकसित राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना प्रभावित होती रहती है जिस पर समसामयिक परिस्थितियों, मानवी आकांक्षाओं का प्रभाव पड़ता रहता है। कल प्रभाव में वर्तमान अतीत से भिन्न प्रतीत होता हुआ भी उससे अभिन्न रूप में जुड़ा भी रहता है किसी भी वस्तु का बौद्धिक और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उसे पक्षों, खंडो, वर्गो यह तत्वों में विभाजित कर दिया जाता है।

    काल विभाजन का लक्ष्य इतिहास के विभिन्न परिस्थितियों के संदर्भ में उसकी घटनाओं एवं प्रवृत्तियों के विकास क्रम को उद्घाटित करना होता है। साहित्य के इतिहास को इसलिए विद्वानों ने विभिन्न काल खंडों में विभाजित करके अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

   हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के क्षेत्र में पहले प्रयास गार्सा द तासी एवं शिव सिंह सिंगार ने किया था लेकिन इन दोनों ने ही काल विभाजन की ओर ध्यान नहीं दिया। काल विभाजन की ओर सबसे पहले जॉर्ज ग्रियर्सन ने ध्यान दिया उन्होंने अपनी इस ग्रंथ में 11 खंडों का विभाजन किया है जो निम्नलिखित हैं-

1. चरण काल

2. 15 वीं शती कथा में पुनर्जागरण

3. जायसी की प्रेम कविता

4. ब्रज का कृष्ण संप्रदाय

5. मुगल दरबार

6. तुलसीदास

7. रीति काव्य

8. तुलसीदास के अन्य परवर्ती

9. 18 वीं शताब्दी

10. कंपनी के शासन में हिंदुस्तान

11. महारानी विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्तान


जो वस्तुत: योग विशेष के द्योतक कम है। अध्यायों के शीर्षक अधिक है। इसके अतिरिक्त कालक्रम का प्रभावी इसमें लगातार नहीं चलता। यथार्थ चरण का हाल 700 से 1500 ईसवी के बाद एकाएक वे 15 वी शताब्दी में पहुंच जाते हैं। पूरी 14वीं शताब्दी का इतिहास से निकाल देते हैं। कालों का नामकरण भी सर्वत्र किसी एक आधार पर नहीं है कहीं किसी धार्मिक संप्रदाय को इसका आधार बनाया गया है तो कहीं शासक विशेष की ओर कहीं शताब्दी का ही उल्लेख मात्र है। साथ ही तथ्यों की दृष्टि से इसमें सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि सातवीं शती से लेकर 13 वीं शती तक के समय को इसमें हिंदी साहित्य का एक युग माना गया है। यह भ्रांति उनके पहले और बाद में भी बहुत समय तक चलती रहे। ग्रियर्सन का या प्रयास प्रारंभिक प्रयास मात्र है जिसमें विभिन्न न्यूनतमाओं असंगतियों एवं त्रुटियों का होना स्वाभाविक है।


मिश्र बंधुओं का काल विभाजन और नामकरण :- 

तदांतर मिश्र बंधुओं ने मिश्र बंधु विनोद में काल विभाजन का नूतन प्रयास किया है जो ग्रियर्सन के प्रयास से प्रौढ़ एवं अधिक विकसित है। उनका विभाजन इस प्रकार है-

१. प्रारंभिक काल

क) पूर्वारंभिक काल (700-1343 विक्रम)

ख) उत्तरारंभिक काल (1344-1444 विक्रम)


२. मध्यमिक का काल 

क) पूर्व माध्यमिक काल (1445-1560 विक्रम)

ख) प्रौढ़ माध्यमिक काल (1561-1680 विक्रम)


३. अलंकृत काल

क) पूर्वालंकृत काल (1681-1790 विक्रम)

ख) उतरालंकृत काल (1791-1889 विक्रम)


४. परिवर्तन का काल (1890-1925 विक्रम)


५. वर्तमान काल (1926 अद्यावधि)


जहां तक पद्धति की बात है यह वर्गीकरण बहुत सभ्यक एवं स्पष्ट है किंतु तथ्यों की दृष्टि से इसमें भी अनेक असंगतियां विद्यमान है सबसे पहले तो उन्होंने भी ग्रियर्सन की भांति 700 से 1300 ईवी तक के युग को हिंदी साहित्य के साथ संबंध कर दिया जो मूलतः अपभ्रंश का युग है।

यह भी विचित्र बात है कि वे मध्यकाल में लगभग 200 वर्ष के समय को भी साहित्य की प्रौढ़ता के आधार पर दो भेदों में विभाजित किया गया है -

1. पूर्व माध्यमिक काल

2. प्रौढ़ माध्यमिक काल

जिसका अर्थ है कि 100 वर्षों में ही साहित्य प्रौढ़ हो गया जबकि प्रारंभ में 700-800 वर्षों में भी वह एक सा रहता है। इसी प्रकार अलंकृत काल के बाद परिवर्तन का काल (1890-1925 विक्रम) के रूप में केवल 35 वर्ष के समय को अलग स्थान देना भी अस्वाभाविक प्रतित होता है। प्रत्येक काल के बाद दूसरा काल आने से पूर्व सदा परिवर्तन होता ही है अतः यदि परिवर्तन का काल नामकरण स्वीकार करे तो प्रत्येक काल के पश्चात एक-एक परिवर्तन काल देना होगा जो अनावश्यक हैं। विभिन्न काल खंडो के नामकरण में भी एक जैसी पद्धति नहीं अपनाई गई है जहां अन्य नामकरण विकासवादिता के सूचक है वहां अलंकृत काल आंतरिक प्रवृत्ति के आधार पर है। इन दोषों के होते हुए भी मिश्र बंधुओं के द्वारा किया गया काल विभाजन का यह प्रयास पर्याप्त महत्वपूर्ण एवं प्रौढ़ है इनमें कोई संदेश नहीं।


आचार्य रामचंद्र शुक्ल का काल विभाजन और नामकरण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में इतिहास को 4 काल खंडों में विभाजित किया हैं -

१. आदिकाल (वीरगाथा काल संवत् 1050-1375)

२. पूर्व मध्यकाल (भक्ति काल संवत् 1375-1700)

३. उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल संवत् 1700-1900)

४. आधुनिक काल (गद्य काल संवत् 1900-1984)

     आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काल विभाजन की यदि मिश्र बंधुओं के काल विभाजन से तुलना की जाए तो इसकी कई विशेषताएं सामने आएगी। एक तो उन्होंने मिश्र बंधुओं के प्रारंभिक काल को पूर्वारंभिक सीमा 700 विक्रम के स्थान 1050 विक्रम को मान कर उसे यथार्थ सीमा के थोड़ा निकट ला दिया। दूसरी उन्होंने मिश्र बंधुओं के द्वारा किए गए भेद उपभेदों को संख्या को हटाकर केवल चार तक सीमित कर दिया। इससे इनकी काल विभाजन में अधिक सरलता स्पष्ट था एवं सुबोधता आ गई अपनी इसी विशेषता के कारण यह बहुमान्य और बहु प्रचलित है। शुक्लोत्तर इतिहासकारों में से अनेक ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उपयुक्त काल विभाजन की तीव्र आलोचना तो की तथा उसके अनेक दोषों को भी स्पष्ट किया किंतु उसे संशोधित करके नया रूप देने में किसी को सफलता नहीं मिली।


डॉक्टर रामकुमार वर्मा का काल विभाजन 

शुक्लोत्तर इतिहासकारों में डॉक्टर रामकुमार वर्मा का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने हिंदी साहित्य के आलोचनात्मक इतिहास में हिंदी साहित्य को 5 सालों में विभाजित किया है

१. संधि काल (संवत् 750-1000)

२. चरण काल (संवत् 1000-1375)

३. भक्ति काल (संवत् 1375-1700)

४. रीतिकाल (संवत् 1700-1900)

५. आधुनिक काल (संवत् 1900-अब तक)


जो वस्तुत: गुण वृद्धि का सूचकतम और दोष वृद्धि का द्योतक अधिक हैं। जैसे कि अयंत्र स्पष्ट किया जा चुका है हिंदी साहित्य का आरंभ सातवीं आठवीं शताब्दी से मानना एवं विशेष भ्रांति का परिणाम है। डॉक्टर वर्मा काया संधि काल भी इस भ्रांति से संबंधित है। 

      अतः इसे शुक्ल के काल विभाजन का परिकृष्ट रूप नहीं कहा जा सकता है फिर भी उन्होंने इन्हीं अंशों में आचार्य शुक्ल जी की रोढ़ि को त्यागने का प्रयास अवश्य किया है जो इस युग के लिए कम महत्व की बात नहीं है।


राम बहोरी शुक्ला का विभाजन 

पंडित राम बहोरी और डॉ भागीरथ मिश्र का हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास ग्रंथ में प्रारंभिक काल की सीमाओं में कुछ संशोधन करने के अतिरिक्त सामान्यतः आचार्य शुक्ल के के अनुरूप है।

    काशी नगरी प्रचारिणी सभा द्वारा हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास 18 19 जिल्दों में तैयार हो रहा है। जिसके कुछ भाग प्रकाशित भी हो चुके हैं। स्थूलत: यह भी आचार्य शुक्ल के इतिहास के अनुरूप ही है।

    आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिस्र द्वारा लिखित हिंदी साहित्य का अतीत भी रीतिकाल के नामकरण एवं अंतर्विभाजन के क्षेत्र में नूतन प्रयास करते हुए भी शेष बातों में परंपरा का ही निर्वाह किया है।


डॉ गणपति चंद्रगुप्त के अनुसार काल विभाजन 

डॉ गणपति चंद्रगुप्त ने सांस्कृतिक परंपराओं तथा बाह्य परिस्थितियों के क्षेत्र में रचनाओं एवं काव्य परंपराओं के सम्मिलित करते हुए हिंदी साहित्य का प्रमुख रूप से 3 कालों में विभक्त किया है।

१. प्रारंभिक काल (उन्मेष काल 1184-1350ई.)

२. मध्यकाल या विकास काल (1350-1857ई.)

३. आधुनिक काल 1857 से अब तक

डॉक्टर गुप्त ने प्रारंभिक काल में दो काव्य परंपराओं के प्रवर्तन का उल्लेख किया है।

क) धार्मिक रास काव्य परंपरा

ख) संत काव्य परंपरा


मध्यकालीन परंपराओं को उन्होंने 3 भेदों में समाहित किया है।

क) पूर्व मध्यकाल या उत्कर्ष काल

ख) मध्यकाल या चरमोत्कर्ष काल

ग) उत्तर मध्यकाल या अपकर्ष काल


आधुनिक काल के विभाजन में डॉक्टर गुप्त ने परंपरा का ही पालन किया है-

क) भारतेंदु युग

ख) द्विवेदी युग

ग) छायावाद युग

घ) प्रगतिवाद युग

ड़) प्रयोग युग


    डॉक्टर गुप्त के इस काल विभाजन में विद्या वस्तु भाषा प्रवृत्ति शैली आदि के आधार लक्षित होते हैं। उत्तर मध्य काल को अवकर्ष काल कहना औचित्य पूर्ण नहीं है क्योंकि यह काल काव्य कला का उत्कर्ष काल है। गुप्त जी के हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास में किया गया काल विभाजन अवैज्ञानिक हो गया।


डॉ राम खेलावन पांडे का काल विभाजन

१. संक्रमण काल या प्रवर्तन काल (सन् 1000-1400ई.)

२. संयोजन काल (सन् 1401-1600ई.)

३. संवर्धन काल (सन्1601-1800ई.)

४. संचयन काल (सन् 1801-1900ई.)

५. संबोधित काल (सन् 1901-1947ई.)

६. संचरण काल (सन् 1947-..........)

इस विभाजन तथा नामकरण में लेखक स्वयं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है। अखंड काल प्रवाह को सुंदर अनुप्रासिक अभिधान अवश्य प्राप्त हुआ है।


डॉ मोहन अवस्थी का काल विभाजन

डॉ मोहन अवस्थी ने हिंदी साहित्य का अद्यापन इतिहास में नामकरण एवं काल विभाजन इस प्रकार किया है।-

१. आधार काल (सन् 700-1400 तक)

२. भक्ति काल (सन् 1400-1600तक)

३. रीतिकाल (सन् 1600-1875 तक)

४. विद्रोह काल (सन् 1857-अब तक)


हजारी प्रसाद द्विवेदी का काल विभाजन और नामकरण

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने साहित्य इतिहास के नामकरण व काल विभाजन का आधार संवत् के स्थान पर पूरी सदी को माना है और हिंदी साहित्य के इतिहास को चार काल खंड में विभाजित किया है- 

१.आदिकाल (सन् 1000-1400 ई.)

२.भक्तिकाल (सन् 1400-1700 ई.)

३.रीतिकाल (सन् 1700-1900 ई.)

४.आधुनिक काल (1900 से आगे)


श्यामसुंदर दास का काल विभाजन और नामकरण

श्यामसुंदर दास ने अपने साहित्य इतिहास के नामकरण व काल विभाजन का आधार संवत् को माना है और हिंदी साहित्य के इतिहास को चार काल खंड में विभाजित किया है जो इस प्रकार से है- 

१.वीरगाथा युग ( संवत् 1050-1400)

२.भक्तियुग (संवत् 1400-1600) 

३.रीतियुग (संवत् 1600-190) 

४.नवीन विकास युग ( संवत् 1900 से आगे)


रामस्वरूप चतुर्वेदी का काल विभाजन और नामकरण

रामस्वरूप चतुर्वेदी ने भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार ही काल विभाजन किया और हिंदी साहित्य के इतिहास को चार काल खंड में विभाजन किया- 

१.वीरगाथा काल (1000-1350 ई.) 

२.भक्ति काल (1350-1650 ई.)

३.रीतिकाल ( 1650-1850 ई.)

४.गद्य काल (1850 से आगे)


विभिन्न काल खण्डों के नामकरण

1. आदिकाल

(i) वीरगाथाकाल - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

(ii) आदिकाल - हजारीप्रसाद द्विवेदी

(iii) चारणकाल - डॉ. रामकुमार वर्मा

(iv) बीज वपन काल - महावीरप्रसाद द्विवेदी

(v) सिद्ध सामन्त युग - राहुल सांकृत्यायन

(vi) आरम्भिक काल - मिश्र बन्धु

(vii) प्रारम्भिक काल - डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त


2. पूर्व मध्यकाल - भक्तिकाल ।

3. उत्तर मध्यकाल - रीतिकाल, अलंकृतकाल, शृंगारकाल, कला काल।

4. आधुनिक काल - गद्यकाल, वर्तमान काल ।


स्पष्ट है कि प्रथम कालखण्ड के नामकरण पर ही अधिक विवाद है। हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में जो नाम सर्वाधिक प्रचलित हैं, वे इस प्रकार हैं :

1. आदिकाल(1000 ई. से 1350 ई.)

2. भक्तिकाल (1350 ई. से 1650 ई.)

3. रीतिकाल(1650 ई. से 1850 ई.)

4. आधुनिक काल (1850 ई. से अब तक)

उक्त नाम ही अब सर्वस्वीकृत हैं। इतिहास ग्रन्थों में इन्हीं का प्रयोग होता है।


इस प्रकार हिंदी साहित्य इतिहास के काल विभाजन और नामकरण के परिपेक्ष में विभिन्न मतों और प्रयासों के बाद निष्कर्ष यह निकलता है कि कोई नाम एकदम से पूर्ण और उपयुक्त नहीं है। कुछ नामकरण तो सर्वथा भ्रामक हैं सरलता संक्षिप्तता सुस्पष्टता सुबोधता की दृष्टि से आचार्य शुक्ल के द्वारा किया गया काल विभाजन श्रेष्ठ प्रतीत होता है। यही कारण है बाद के अनेक विद्वानों में उनके द्वारा किए गए काल विभाजन में त्रुटियों और दोष दर्शन के बावजूद इसी का निर्वाद प्रचलन होता गया।

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