मूल्यांकन क्या है। मूल्यांकन की अवधारणा। मूल्यांकन के रूप

मूल्यांकन क्या है। मूल्यांकन की अवधारणा। मूल्यांकन के रूप

 मूल्यांकन क्या है(mulyankan kya hai)

मूल्यांकन शैक्षिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है मूल्यांकन केवल शैक्षिक प्रक्रिया का ही नहीं वरन जीवन की प्रत्येक प्रक्रिया हैं। मूल्यांकन का महत्वपूर्ण अंग है हमारे जीवन का प्रत्येक क्षेत्र मूल्यांकन की अपेक्षा करता है। जिस प्रकार डॉक्टर अपनी दवा की उपयोगिता का मूल्यांकन रोगी में होने वाले परिवर्तन के अनुसार करता है। इसी प्रकार शिक्षक अपने बालकों के व्यवहार में परिवर्तन का मूल्यांकन विभिन्न विधियों द्वारा करता है। मूल्यांकन के अभाव के कारण हमारी समस्त क्रियाएं मूल्यहीन बन सकती है। मूल्यांकन से सफलताओं, विफलताओं, कठिनाइयों आदि का निर्धारण हो जाता है जिसके फलस्वरूप हम भविष्य में सतर्क हो जाते हैं।

इसे भी पढ़े: पाठ योजना का महत्व

मूल्यांकन की परिभाषाएं (mulyankan ki paribhasha)

कोठारी आयोग के अनुसार

"मूल्यांकन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह समस्त शिक्षा क्रम का महत्वपूर्ण अंग है और इस प्रकार इसका शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ संबंध है।"


माइकेलिस के अनुसार

"मूल्यांकन उद्देश्यों की प्राप्ति की सीमा का निर्णय करने की प्रक्रिया है।"


मूल्यांकन की अवधारणा (mulyankan ki avdharna)

मूल्यांकन की अवधारणा को दो भागों में विभाजित किया गया है

१. मूल्यांकन की परंपरागत अवधारणा

२. मूल्यांकन की आधुनिक अवधारणा


१. मूल्यांकन की परंपरागत अवधारणा :

परीक्षा प्रणाली उतना ही प्राचीन है जितना कि ज्ञान देने, प्राप्त करने की प्रक्रिया। प्राचीन काल में आज कल की भांति कागज पेंसिल द्वारा परीक्षाओं का उल्लेख नहीं मिलता। उस समय मौखिक परीक्षा तथा छात्रों के कौशलों से संबंधित प्रायोगिक परीक्षाओं का प्रचलन था। अतः मूल्यांकन की अवधारणा का प्रमुख साधन परीक्षा थी।


२. मूल्यांकन की आधुनिक अवधारणा

छात्रों की उपलब्धियों एवं उनके विकास के मापन के लिए अब परीक्षा के स्थान पर मूल्यांकन शब्द का प्रयोग होने लगा है। अब मूल्यांकन का अर्थ औपचारिक रूप में सत्र में एक या दो बार परीक्षा लेकर छात्रों को उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण घोषित कर देना मात्रा नहीं रहा गया। इसमें शिक्षण के उद्देश्य शिक्षण अधिगम परिस्थितियां तथा मूल्यांकन अंत: निर्भर तथा अन्त: संबंधित हो गया है। अब मूल्यांकन शिक्षा का अभिन्न अंग बन गया है।


मूल्यांकन के रूप या परीक्षा के रूप mulyankan ke prakar

मूल्यांकन के दो प्रकार है-

१. निबंधात्मक मूल्यांकन

२. वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन

१.निबंधात्मक मूल्यांकन:-

न केवल भारत में ही वरन विश्व के अनेक राष्ट्रों में बड़े लंबे समय से निबंधात्मक परीक्षाओं का प्रभुत्व रहा है भारत में तो आज भी इन परीक्षाओं का बाहुल्य है। विश्वा के कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले देशों में इन परीक्षाओं को अपना महत्व को देना पड़ा है। इस प्रकार के परीक्षा में पाठ्यक्रम के कुछ अंशों पर प्रश्न दे दिए जाते हैं और उन प्रश्नों का उत्तर निर्धारित समय में अपने स्वतंत्र भाषा में इच्छा अनुसार लिखते हैं


निबंधात्मक परीक्षा के गुण:-

i. इन परीक्षाओं से छात्रों के भाव व्यक्त क्षमता का बोध होता है।

ii. इन परीक्षाओं के छात्रों की भाषा शैली एवं लेखन कला का ज्ञान होता है।

iii. परीक्षाएं छात्राओं को पर्याप्त स्वतंत्रता प्रदान करती है। इन परीक्षाओं के लिए प्रश्न पत्र पर सरलता से बनाए जा सकते हैं।

iv. निर्माण समय तथा धन की दृष्टि से प्रश्न पत्र मित व्ययी होती है।

v. यह परीक्षाएं समूह परीक्षण के लिए उत्तम होती हैं। यह परीक्षाएं रचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करती है।

vi. छात्रों को इन परीक्षाओं के लिए सरलता पूर्वक प्रशिक्षित किया जा सकता है।


निबंधात्मक परीक्षा के दोष

i. परीक्षा शिक्षा का एक साधन होनी चाहिए। परंतु आजकल व शिक्षा का लक्ष्य बन गया है। बालक पढ़ते हैं शिक्षक पढ़ाते हैं। किस लिए ? किस उद्देश्य से? केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने या कराने के लिए।

ii. यह केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित रहती हैं। भावना के वास्तविक प्रगति की जांच नहीं कर पाती हैं।

iii. परीक्षा विद्यार्थियों के लिए भयानक स्वपन बन गई है। इसने छात्रों के नैतिक स्तर को भी गिरा दिया गया है। क्योंकि परीक्षा उत्तीर्ण करना तथा कराना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य हो गया है।

iv. यह विद्यालय के कार्यों पर भी दूषित प्रभाव डालती है। सभी कार्य इसी की प्राप्ति के लिए निछावर कर दिए जाते हैं। यहां तक की समय तालिका गृह कार्य पाठ्यक्रम आदि सभी इसी के द्वारा शासित किए जाते हैं।

v. स्मरण शक्ति पर अधिक बल देती है।

vi. छात्रों के मस्तिष्क में ज्ञान तो भर देती है परंतु उसका प्रयोग नहीं सिखाती है।

vii. सीमित प्रतिनिधित्व।

viii वैधता का अभाव।

ix.विश्वसनीयता का अभाव।

x. भविष्यवाणी का अभाव

xi. अंकन में विविधता

xii.अंकन में अधिक समय


२. वस्तुनिष्ठ परीक्षा

वस्तुनिष्ठ परीक्षाएं वस्तुस्थिति पर आधारित होती हैं। उत्तर देने की छात्रों को स्वतंत्रता नहीं होती हैं। छात्रा अपनी इच्छा से चाहे जो कुछ तथा चाहे जिस प्रकार उत्तर नहीं दे सकते। प्रत्येक प्रश्न का एक विशिष्ट उत्तर देने की आशा की जाती है यदि छात्र का उत्तर उस विशिष्ट उत्तर से भिन्न होता है। तो वह गलत समझा जाता है कि उनके उत्तर अत्यंत संक्षिप्त प्रायः एक शब्द में होते हैं।

वस्तुनिष्ठ परीक्षा के गुण

i. यह संपूर्ण पाठ्यक्रम पर फैली होती है

ii. छात्रा अध्यापकों धोखा नहीं दे सकते हैं।

iii. उत्तर देना सरल होता है।

iv. उत्तरों पर अंक प्रदान करना सरल होता है।

v. पक्षपात हिना रूप में अंक प्राप्त किए जाते हैं।

vi. अधिक विश्वासनीय होता है।

vii. इमेज छात्रों के न केवल ज्ञान का ही पता चलता है। वरन उनके समय ध्यान, निर्भय सत्य का भी पता चलता है।

viii. छात्रों की भाषा संबंधि कमजोरियां उत्तर देने में बाधक नहीं बनती हैं।

वस्तुनिष्ठ परीक्षा के दोष

i. प्रश्न पत्र निर्माण में बहुत अधिक समय तथा श्रम लगता है।

ii. इनमें अंदाज से उत्तर देने की संभावनाएं काफी अधिक होती है।

iii. भाषा शक्ति तथा भाव व्यक्त करने की क्षमता का इनमें पता नहीं चलता है।

iv. इनमें नकल करने के अवसर बढ़ जाते हैं।

v. इस समय तत्व का बड़ा ध्यान रखना पड़ता है

वस्तुनिष्ठ परीक्षा के प्रकार

१. मिलन पद प्रश्न

२. रिक्त स्थानों की पूर्ति प्रश्न।

३. सत्य और असत्य प्रश्न।

४. सरल स्मरण प्रश्न।

५. सर्वोत्तम उत्तर।

६. अपवत्य चयन प्रश्न

७. वर्गीकरण परीक्षा


टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां