शिक्षा के उद्देश्य को प्रभावित करने वाले कारक

शिक्षा के उद्देश्य को प्रभावित करने वाले कारक

शिक्षा का उद्देश्य को प्रभावित करने वाले कारक(shiksha ke uddeshya ko prabhavit karne wale karak)

शिक्षा का उद्देश्य व्यापक होता है तथा उनके उद्देश्य विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है जो निम्नलिखित है:

१. दार्शनिक कारक

२. सांस्कृतिक कारक

३. समाजशास्त्रीय कारक

४. आर्थिक कारक

५. राजनीतिक कारक

६. पर्यावरणीय कारक

७. नैतिक कारक

८. धार्मिक कारक

९. वैज्ञानिक तथा उद्योगिकी कारक

१०. भविष्य की मांगे


१. दार्शनिक कारक :-

विभिन्न काल में समाज का उद्देश्य शिक्षा के उद्देश्यों को विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत प्रभावित करते रहते हैं, जिसके कारण शिक्षा के उद्देश्य निरंतर बदलते रहते हैं। तथा शिक्षा के उद्देश्यों को आवश्यकता के अनुसार परिवर्तित किया जाता रहता है। जैसे बौद्ध काल में भगवान बुध की दर्शनिक और धार्मिक शिक्षाएं फैली थी तथा बड़े-बड़े समाज था। शासक अशोक कनिष्ठ भी उससे प्रभावित हुए थे अत: उस समय शिक्षा का उद्देश्य बौद्ध दर्शन को प्रसारित करना था तथा हिंदू धर्म में चली आ रही जातिवाद, छुआछूत स्त्रियों के प्रति दासता अंधविश्वास का विरोध करना या मुस्लिम काल में इस्लाम धर्म के जो भी शासक हुए उनका शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रसार करना था। अतः कह सकते हैं कि जिस काल में जिस प्रकार के दार्शनिक आए तथा उन्होंने जिस प्रकार से उद्देश्य दिए उसी का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ा।


२. सांस्कृतिक कारक :-

 प्रत्येक समाज की अपनी विशेष संस्कृति होती है, उसके विशेष आदर्श मूल्य प्रतिमान मान्यताएं रीति रिवाज और जीवन शैली होती है, नई पीढ़ी को उसमें डालने शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य माना जाता है। अतः शिक्षा समाजीकरण का प्रमुख साधन है, जिसके द्वारा संस्कृति के अनुसार ही गुरुकुल ओ और आश्रमों में गुरु अपने विद्यार्थी को शिक्षा देते हैं। विश्व भर में ईसाइ संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति के अनुसार ईसाई शिक्षा और मुस्लिम शिक्षा के उद्देश्य प्रभावित हुए 20 वी शताब्दी एवं 21वीं शताब्दी में धर्म निरपेक्षता से प्रभावी संस्कृति का विकास हुआ है उसके अनुसार यह शिक्षा का मुख्य उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता की जीवन शैली में आस्था रखना और उसके अनुसार व्यवहार एवं कार्य करना आवश्यक बन गया है।


३. समाजशास्त्रीय या सामाजिक कारक :- 

किसी भी समाज की जैसी सामाजिक व्यवस्था या स्तर होती है। उससे शिक्षा के उद्देश्य प्रभावित होते हैं। जैसे आर्य समाज में जाति व्यवस्था पनपी या ब्राह्मणों की जाति सर्वोच्च जाति मानी गई। अतः उनकी जीवनशैली आचरण आदर्श मानी गई। और शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य उनके जैसे बनना रहा। दलितों और जनजातियों की सामाजिक, आर्थिक दशा बहुत निम्न और खराब थी अतः उन्हें शिक्षा से वंचित किया गया। स्वतंत्र भारत में सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करना है। आज के समाज में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। अतः शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य भेदभाव रहित समाज का निर्माण करना है। जिसे सभी का समान विकास हो।


४. आर्थिक कारक : 

मानव जीवन में धन संपत्ति का बहुत ही अधिक महत्व है अतः शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करने में आर्थिक कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पूंजीवाद की आर्थिक नीति व वर्ग संघर्ष उत्पन्न किया है। बल्कि जनसाधारण में आर्थिक चिंताएं असुरक्षा तथा बेरोजगारी बढ़ी है। वर्तमान वैश्वीकरण की बढ़ती हुई, प्रवृत्तियों ने आर्थिक चिंताएं एवं कष्ट बढ़ाए हैं, इन से प्रभावित होकर अब शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य नौकरी या व्यवसाय की शिक्षा देना बन गया है। अधिकतर विद्यार्थी परंपरिक विषयों जैसे दर्शन कला धर्म संस्कृति आदि को बढ़ाना नहीं चाहते बल्कि विभिन्न व्यवसाय आधारित शिक्षा जैसे MBA, MCA, ENGINEERING, B.Ed. आदि पर ज्यादा ध्यान में आर्थिक संपन्नता आ सके। और अपने आप को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकें।


५. राजनीतिक कारक :- 

समाज के विकास में राजनीतिक दृष्टिकोण का व्यापक प्रभाव पड़ता है। किसी भी देश यह समाज के विकास में उस देश पर शासन करने वाले लोगों को राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। यदि समाज का शासक तानाशाही प्रवृत्ति के होंगे तो निश्चय ही वे शिक्षा के उद्देश्यों को ही तानाशाही प्रवृत्ति का विकास करना रखेंगे। अर्थात् शिक्षा के माध्यम से ऐसे समाज का निर्माण करने का प्रयास करेंगे जिसमें सिर्फ शक्तिशाली लोगों का अधिकार हो। इसके विपरीत प्रजातांत्रिक समाज में राजनीतिक विचारधारा सभी का समान विकास करना है। अतः ऐसे समाज में शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। यह तभी संभव है जब समाज के लोगों में राजनीतिक जागरुकता आएगी। वे अपने अधिकार तथा कर्तव्य को सही तरह से समझ सकेंगे तथा समाज का विकास में अपना संपूर्ण योगदान दे सकेंगे।


६. पर्यावरणीय कारक :- 

पिछले एक सौ वर्षो का अगर पर्यावरण का अध्ययन किया जाए तो या पता चलता है कि इसमें निरंतर कमी देखी गई है, विलासिता की प्रवृत्ति लोगों में बढ़ी है। जंगलों को तेजी से काटा जा रहा है। पशु पक्षी मर रहे हैं। नदियों में कल कारखानों की गंदगी निरंतर फेंकी जा रही है। जल और वायु भयंकर रूप से दूषित हो रहे हैं। विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपादाएं बढ़ी है। अतः सभी देशों में यह गंभीरता पूर्वक महसूस किया जा रहा है कि विद्यार्थियों को प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति सजग बनाया जाए। उन्हें पर्यावरण को संतुलन रखना सिखाया जाए। अतः आज के शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा को विशेष स्थान दिया गया है। जिसे बालक अपने जीवन में पर्यावरण को महत्व दे सके। पर्यावरण के संरक्षण का ज्ञान प्रबल करके ही वे पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।


७. नैतिक कारक :- 

शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण में नैतिक कारक के महत्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्ति तथा समाज दोनों का वास्तविक तथा स्थाई कल्याण उत्तम नैतिक चरित्र से ही संभव है। बालक का नैतिक विकास करने के लिए उनकी दानवीय प्रवृत्तियों का दमन करना अति आवश्यक है। शिक्षा ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा बालक के मन में पुण्य के प्रति प्रेम या अच्छा के प्रति प्रेम तथा पाप घृणा उत्पन्न के प्रति प्रेम उत्पन्न किया जा सकता है। समाज के अंदर प्रेम सहानुभूति दया सद्भावना तथा प्रियता आदि सामाजिक एवं नैतिक गुणों को विकसित करके बालक को चरित्र वन बनाया जा सकता है। मानव को विनाश से बचाने के लिए उसकी नैतिक चरित्र का विकास करना प्रमुख आवश्यक है जिस देश में नागरिक बड़ों का आदर नहीं करते, सत्य नहीं बोलते तथा जो न्याय को न्याय नहीं समझते। उस देश का पतन होना निश्चित है। देश को उन्नत बनाने के लिए नागरिकों को चरित्रवान बनाना आवश्यक है। इसके लिए पाठ्यक्रम के अंतर्गत उन विषयों को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए जो नैतिक विचारों से भरे हैं। इस दृष्टि से पाठ्यक्रम में इतिहास साहित्य दर्शन महान व्यक्तियों के जीवन से संबंधित तथ्य आदि की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।


८. धार्मिक कारक : 

मानव जीवन में धर्म का विशेष स्थान होता है। धर्म का मुख्य आधार विश्वास है जो मानव व्यवहार के प्रत्येक क्षेत्रों को नियंत्रित करता है धर्म का निर्माण विभिन्न विषयों और संस्कारों द्वारा होता है। धर्म का मुख्य उद्देश्य नैतिक एवं धार्मिक मूल्यों की स्थापना करना है तथा व्यक्ति को भावात्मक सुरक्षा प्रदान करना है। अतः जिस समाज के धार्मिक विचारधारा जिस प्रकार से होगा वहां की शिक्षा व्यवस्था भी उसी के अनुरूप होगी। कट्टर धार्मिक समाज अपने धर्म को ही श्रेष्ठ मानता है, वे अपने धर्मों का प्रचार तथा दूसरे धर्मों के प्रति हीनता की भावना रखते हैं वे शिक्षा के माध्यम से अपने धर्म का प्रचार करते हैं। वैदिक कालीन शिक्षा धार्मिकता से ओतप्रोत थी धर्म को अधिक महत्व दिया जाता है। शिक्षा के उद्देश्य एवं पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी धार्मिक आदर्शों के अनुरूप किया जाता है धर्मनिरपेक्ष समाज में सर्व धर्म की शिक्षा देना शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है, सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना तथा सभी धर्मों के भावनाओं को समान देना है।


९. वैज्ञानिक तथा उद्योगिकी कारक : 

20 वीं तथा 21वीं शताब्दी में विज्ञान एवं तकनीकी का बहुत अधिक विकास हुआ है पर निरंतर होता रहा है, जीवन में तर्क ज्ञान विज्ञान तकनीको प्रगति का महत्व बढ़ा है। अतः आधुनिक शिक्षा इनसे प्रभावित हो रहा है और शिक्षा के उद्देश्य इनसे निर्धारित होते हैं। समय के साथ साथ समाज तथा मनुष्य की आवश्यकता है निरंतर बढ़ती रहती है, बढ़ती मांगो को पूरा करने के लिए शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन करना आवश्यक है शिक्षा में वैज्ञानिक सोच के माध्यम से पुरानी धारणाओं को सुधारा जा सकता है। एवं सत्य तक पहुंचा जा सकता है। तकनीकी के प्रयोग से जीवन को सरल तथा सहज बनाया जा सकता है। विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए आविष्कार किये जा सकते हैं। कम समय में अधिक उत्पादन किया जा सकता है इसके लिए शिक्षा के माध्यम से तकनीकी की प्रयोग पर बल दिया जाए। शिक्षा प्रदान करने के साधन के रूप में जनसंचार के साधन जैसे विज्ञापन, इंटरनेट, फिल्म समाचार पत्र दूरदर्शन आदि का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाए।


१०. भविष्य की मांगे:

इस विद्वानों ने भविष्य की मांगों आवश्यकताओं और असीम संभावनाओं की ओर विश्वा का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि भविष्य की शिक्षा को वर्तमान योग्य की पुरानी अनुपयोगी शिक्षा से बहुत भिन्न प्रकार का होना चाहिए भविष्य में व्यक्तियों की जैसी परिस्थितियां सामने आए उसके अनुसार तुरंत सही ढंग से स्वयं को समायोजित करने की क्षमता का विकास करना होगा। शिक्षा को इसके लिए तैयार रखना होगा अर्थात् व्यक्ति की भविष्य में अपनी भूमिका क्या होगी। उसके बारे में लगातार चिंतन परिस्थितियों का मूल्यांकन करता रहे। और उसमें स्पष्टता को पाने का प्रयास करते रहे। भविष्य की शिक्षा के माध्यम से ही बालकों में भविष्य के प्रति चेतना जागरूकता सोचने समझने की प्रवृत्ति तथा भविष्य में आने वाले मुश्किल परिस्थितियों से बचने के लिए भविष्य उपयोगी सामाजिक तथा सांस्कृतिक गुणों जैसे कुशलता समायोजन शक्ति को विकसित किया जाए।



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