चित्रकला किसे कहते हैं, चित्रकला के आधार, अंग

चित्रकला किसे कहते हैं

किसी भी वास्तविक या काल्पनिक वस्तु को मूर्त रूप में प्रस्तुत करना चित्रकला कहलाता है।

जब कोई व्यक्ति किसी निर्जीव या सजीव का कही भी चित्रित या स्वरूप तैयार करता है तो उसे चित्रकला कहते हैं।


चित्रकला आकृति और रंग का अद्भुत प्रदर्शन है। समस्त शिल्पों और कलाओं में प्रधान तथा सर्वप्रिय चित्रकला को ही माना गया है। यह माना जाता है कि चित्रकला भौतिक, दैविक एवं आध्यात्मिक भावना तथा सत्यम्, शिवम् और सुंदरम् की समन्वित रूप की अभिव्यक्ति है। चित्र का स्वरूप रेखा, वर्ण, वर्त्तना और अलंकरण इन चारों की सहायता से बनाया जाता है। प्राचीन काल में तीन ही प्रकार के चित्र बनते थे 

  • १.भित्ति चित्र
  • २.पट चित्र
  • ३.फलक चित्र
आज के आधुनिक युग में चित्रकला में चेतन कला का प्रमुख स्थान है। आधुनिक चित्रकला या चित्रकार कल्पना में पूर्ण विश्वास रखता है। पहले चित्रकला गुफाओं में एवं पत्थरों में ही दिखाई पड़ते थे जो किसी पशु-पक्षी या जंत्र-मंत्र जादू-टोने पर आधारित था पर आज चित्रकला एक व्यवसाय के रूप में भी तैनात है जो देश-विदेशों में तेज़ी के साथ बढ़ती नज़र आ रही है।

चित्रकला के आधार

चित्रकला के लिए निम्नलिखित आधार है जो चित्रांकन तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:-

१. बिंदु:-

बिंदु की केवल स्थिति होती है जिसकी लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई नहीं होती है। बिंदु का संग्रह से भी चित्रकारी किया जा सकता है।

२. रेखा:

चित्रांकन किसी भी तरीके का करना हो तो रेखाओं के द्वारा ही बनाया जाता है। यह रेखाएं सीधी, टेढ़ी, तिरछी, लहरीदर, गोलाई आदि अनेकों प्रकार की हो सकती हैं। अत: रेखाओं की महत्व को समझना बहुत जरूरी होता है क्योंकि रेखाओं में वह शक्ति हैं कि हम प्रत्येक भाव एवं अनुभूति को रेखाओं द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं। चित्रकला में कई प्रकार की रेखाओं का प्रयोग किया जाता है जो निम्नलिखित है-
i. सरल रेखा: यह रेखा शक्ति को प्रकट करती है
ii. वक्र रेखा: इसमें जिओ की स्थिरता का भाव जाहिर होता है
iii. गेटेड रेखा: इस रेखा से व्याकुलता जाहिर होता है।
iv. सरल लंब रूप रेखा: इस रेखा से नित्यता तथा दृढ़ता जाहिर होता है।
v. क्षितिज रेखा इस रेखा की सहायता से खामोशी, शांति प्रदर्शित किया जाता है।
vi. तिरछी रेखा: यह रेखा गति भाव आदि प्रदर्शित करते हैं।
vii. टेढ़ी रेखा: इस रेखा का उपयोग शान, सौरभ, शोभा के लिए किया जाता है।
viii. समानांतर रेखा: इस रेखा से किसी भी गहराई को दर्शाया जाता है।
ix. फ्रॉस रेखा: इस रेखा से संदेह तथा गड़बड़ी को प्रदर्शित किया जाता है


चित्रकला के कितने अंग होते हैं

चित्रकला के छः अंग होते हैं।
१.रूपभेद    २.प्रमाण    ३.भाव योजना      ४.लावण्य    ‌‌५.सदृश्य  ६.वर्णिका भंग

रूपभेद – चित्रों में विभिन्न प्रकार के आकार रूप को दर्शाया जाता है उसी को रूपभेद कहा जाता है।

प्रमाण – चित्रकला का दूसरा महत्वपूर्ण अंग प्रमाण है। बनाए गए चित्र सही माप तथा सही अनुपात का हो वही उसका प्रमाण होता है

भाव योजना – सभी चित्रों में कुछ ना कुछ भाव योजनाएं होते ही हैं हर चित्र में भाव योजना दर्शाए जाते हैं जैसे‌ करुणा, भयानक, शांति, हास्य, प्रसन्नता, वीरता जैसे  अनेकों भावों को चित्रकला के माध्यम से दर्शाया जा सकता है।.

लावण्य –  लावण्य का अर्थ होता है सलोना, आभा, सौन्दर्य या सुन्दरता। चित्रकला का एक महत्वपूर्ण अंग लावण्य भी होता है क्योंकि प्रत्येक चित्र में लावण्य में विराजमान होता है।

सदृश्य – चित्रकला का महत्त्वपूर्ण अंगों में सदृश्य भी है सदृश्य यानी उसी के समान दिखाई देना। चित्रकला के माध्यम से किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु को हु ब हू  दिखाने का प्रयास किया जाता है।

वर्णिका भंग – वर्णिका भंग का अर्थ होता है किसी चित्र में रंगों का समवाय या रोशनाई या स्याही या चित्र में उचित रंग भरना।

चित्रकला में प्रयुक्त सामग्री/ चित्रकला में आने वाली आवश्यक सामग्री:

चित्रकला में आने वाले आवश्यक सामग्रियों का प्रयोग इस प्रकार से है-
१. चित्रांकन कागज:
चित्रांकन के लिए चित्र कागज व्यवहार में लाया जाता है। ये विभिन्न प्रकार के होते हैं और इसके नाम भी अलग-अलग होते हैं जैसे कॉटेज पेपर, ट्रेसिग पेपर, ड्राइंग शीट (चार्ट पेपर), हैंड मेड पेपर, कैनवस पेपर, स्कॉलर मेंट पेपर इत्यादि।
  • जल रंग के लिए मेंट, स्कॉलर, एवं हैण्डमेट  पेपर की आवश्यकता पड़ती है।
  • तेलिया रंग के लिए ऑयल पेपर की आवश्यकता पड़ती है।
  • पेस्टल रंग के लिए पेस्टल पेपर की आवश्यकता पड़ती है।

२. चित्रांकन बोर्ड
चित्रांकन बोर्ड को रचना पट भी बोला जाता है। रचना पट का प्रयोग कागज को साधने या चिपकाने में प्रयोग किया जाता है। यह बोर्ड ऐसी लकड़ी का होना चाहिए जिस पर विभिन्न मौसम का प्रभाव ना हो तथा चिकना तथा सपाट हो तभी सही आकृति खींचा जा सकता है।

३. रंग:
जल रंग, डिस्टेंपर, पेंसिल कलर, मोम कलर, पेस्टल कलर, ऑयल कलर आदि।

४.स्पना पिन:
इसका प्रयोग चित्रांकन बोर्ड पर कागज को साधने या टिकाने के लिए किया जाता है। उत्तम पिन उसे कहा जाता है जिसकी नॉक छोटी एवं नुकीली होती है। पट्टी पर इंच तथा सेंटीमीटर के चिन्ह होते हैं और इसके द्वारा रेखाएं खींची जाती है।
       इसके अलावा रचना क्लिप उपयोग में लाया जाता है। यह बड़ी आसानी से कागज एवं बोर्ड में 4 क्लिप की आवश्यकता है।

५. तेल:
रंगों को तैयार करने के लिए तेल या पानी की आवश्यकता पड़ती हैं जैसे तारपीन का तेल, केरोसिन का तेल आदि।

६. पेंसिल:
चित्रकार रेखा खींचने के लिए पेंसिल का प्रयोग करते हैं। पेंसिल के अविष्कार से पूर्व रेखा खींचने के लिए लेड की पतली सिलाई का प्रयोग किया जाता है लेड ग्रेफाइट का मुलायम पत्थर पीसकर उसमें उचित मात्रा में मिट्टी मिलाकर पतली बत्ती बनाकर पकाया जाता है। साधारण चित्रांकन में काम आने वाली निम्नलिखित पेंसिल है:

HB : पेंसिल ड्राइंग में साधारणतः इसी पेंसिल का प्रयोग किया जाता है। यह एक मध्यम प्रकार का पेंसिल जो ना तो ज्यादा मुलायम होती है ना कठोर।

4B: पेंसिल काफी काली होती है पिया पेंसिल का प्रयोग अधिकतर सेंडिंग में किया जाता है।

6B तथा 8B : ये पेंसिल अधिकतम काली होती है। इसका प्रयोग भी सेंडिंग करने और काला करने में किया जाता है।

चारकॉल: अधिकतर काला करने के लिए किया जाता है।

७. रबर:
रचनात्मक कार्य करने के लिए मुलायम रबर का प्रयोग किया जाता है जिससे अनचाहा पेंसिल के लकीरों को मिटाया जा सकता है। ड्राइंग में कठोर रबड़ का प्रयोग कागज के धरातल को नष्ट कर देता है।

८. परकार:
इसके द्वारा विभिन्न प्रकार की ज्यामिति आकृतियों की रचना की जाती है जैसे चाप, अर्धवृत्त आदि।

९. रचना रेखनी:
इसके द्वारा बनाई गई रे चित्र को अंतिम आकृति देने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह विशेष प्रकार की स्याही होता है जैसे आंख के कर्ल के लिए उपयोग किया जाता है।

१०. तश्तरी:
रंग मिश्रण के लिए एवं उसे रखने के लिए विशेष रूप से प्रयुक्त किए गए पात्र का तश्तरी कहते हैं। तरल रंगों के व्यवहार हेतु या अत्यंत उपयोगी वस्तु है जल रंग या तेल रंग के उपयोग के लिए साधारणतः अलग-अलग तश्तरी का प्रयोग होता है।

११. तूलिका ब्रश:
रंगीन चित्रण जल रंग तेल रंग के लिए ब्रश का प्रयोग किया जाता है। जो निम्नलिखित है-

  • गोल ब्रश
  • चपटी ब्रश
  • झाड़ू तूलिका


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