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स्मृति की अवधारणा (concept of memory)

व्यक्ति के जीवन में स्मृति(memory) की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है बिना स्मृति के व्यक्ति को अपना जीवन सुचारू रूप से चलाना कठिन हो जाता है। स्मृति शक्ति (memory power) के अभाव में उच्च स्तरीय मानसिक कार्य नहीं किए जा सकते हैं। अधिगम की प्रक्रिया में स्मृति की आवश्यकता होती है इसके लिए छात्र को किस विधि से प्रशिक्षण या शिक्षा दी जाए जिससे की प्रदत्त ज्ञान अधिक से अधिक समय तक उसके मस्तिष्क में बस जाए और उचित समय आने पर छात्र उस ज्ञान का उपयोग कर सके। यह प्रश्न आरंभ से शिक्षाविदों तथा मनोवैज्ञानिकों के लिए खोज एवं अनुसंधान का विषय रहा है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर भी जानने का प्रयास किया जाता रहा है कि बालक अधिगमिक (सीखे हुए) विषय वस्तु को क्यों भूल जाता है इसके लिए कौन-कौन से कारक उत्तरदायी होते हैं एवं विषय सामग्री या पूर्व अनुभवों को ग्रहण करने तथा उनको पुनः उत्पादित। प्रस्तुत करने के बीच कौन सी मानसिक क्रियाएं घटित होती है।

              मनोविज्ञान के क्षेत्र में धारण करने और पुनः प्रस्तुत करने की योग्यता को स्मृति के नाम से जाना जाता है।

स्मृति का अर्थ एवं परिभाषा (meaning and definition of memory),human memory

स्मृति का अर्थ (meaning of memory)

स्मृति एक मानसिक क्रिया है। स्मृति का आधार अर्जित अनुभव है। इसका पुनर्उत्पादन प्रस्तुति के अनुसार होता है। हमारे बहुत से मानसिक संस्कार स्मृति के माध्यम से ही जागृत होता है।
     स्टार्ट एवं ओकडन के अनुसार- "स्मृति एक जटिल शारीरिक और मानसिक प्रक्रिया है जिसे हम थोड़े से शब्दों में इस प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं। जब हम किसी वस्तु को छूते हैं देखते हैं सुनते हैं यह सूंघते हैं तब हमारे ज्ञान वाहक तंतु उस अनुभव को हमारे मास्तिष्क के ज्ञान केंद्रीय में पहुंचा देते हैं।"
         ज्ञान केंद्र में उस अनुभव की प्रतिमा बन जाती है जिसे छाप कहते हैं। यह छाप वास्तव में उस अनुभव का स्मृति चिन्ह होती है जिसके कारण मानसिक रचना के रूप में कुछ परिवर्तन हो जाता है। यह अनुभव कुछ समय तक हमारे चेतन मन में रहने के बाद अचेतन मन में चला जाता है और हम उसे भूल जाते हैं। उस अनुभव को अचेतन मन में संचित रखने और चेतन मन में लाने की प्रक्रिया को स्मृति कहते हैं।
       दूसरे शब्दों में पूर्व अनुभव को अचेतन मन में संचित रखने और आवश्यकता पड़ने पर चेतन मन में लाने की शक्ति को स्मृति कहते हैं।

स्मृति की परिभाषा (definition of memory), human memory


वुडवर्थ के अनुसार (according to Woodworth): जो पहले से घाट चुकी हो उसे याद करना स्मृति कहलाता है।

मैकडूगल के अनुसार (according to McDougall) : स्मृति से अभिप्राय अतीत की घटनाओं की कल्पनाओं से है साथ ही इस तथ्य की पहचान से भी कि यह अतीत के अनुभव है।

स्काउट के अनुसार (according to Stout) : स्मृति एक आदर्श पुनर्रावृति है। जिसमें अतीत काल के अनुभव को उसी क्रम या ढंग से जागृत होता है जैसे कि वे पहले हुए थे।

स्मृति के अंग, स्मृति की प्रक्रिया,स्मृति के तत्व (factors of memory, process of memory, parts of memory),स्मृति के अंगों के नाम बताइए,human memory

स्मृति के 4 अंग होते हैं या स्मृति की चार प्रक्रिया है या स्मृति के चार तत्व हैं:-
१. सीखना (learning)
२. धारण (retention)
३. पुन:स्मरण (recall)
४. अभिज्ञान/पहचान (recognition)

१. सीखना (learning) :

स्मृति का पहला अंग है सीखना हम जिस बात को याद रखना चाहते हैं उसको हम सबसे पहले सीखते हैं या उसे हमें सबसे पहले सीखना पड़ता है।

२. धारण (retention) :

स्मृति की दूसरी प्रक्रिया है धारण। इसका अर्थ है सीखी हुई बात को मस्तिष्क में संचित रखना। हम जो बात सीखते हैं वह कुछ समय बाद हमारे अचेतन में चली जाती है। और वहां वह निष्क्रिय दशा में रहती है इस दशा में वह कितनी समय तक संचित रह सकती हैं यह व्यक्ति की धारण शक्ति पर विशेष निर्भर रहती है।
रायबर्न का विचार अधिकांश व्यक्तियों की धारण शक्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
परिवर्तन ना होने के बावजूद कुछ बातें ऐसी है जो हमें अपने अनुभव को अधिक समय तक स्मरण रखने में सहायता देते हैं जैसे i. स्वस्थ व्यक्ति सीखी हुई बात को अधिक समय तक स्मरण रखता है।

ii. अधिक अच्छी विधि से सीखी हुई बात अधिक समय तक स्मरण रहती है।

iii. सीखी हुई बात को जितना अधिक दुहराया जाता है या अभ्यास किया जाता है उतनी ही अधिक समय तक वह स्मरण रहती है

iv. रुचि से सीखी हुई बात अपेक्षा सरल और रोचक बात अधिक समय तक स्मरण रहती हैं।

v. कठिन और जटिल बात की अपेक्षा सरल और रोचक बात अधिक समय तक स्मरण रहती है।

vi. अत्याधिक दुख सुख भय निराश आदि बातें मस्तिष्क पर इतनी गहरी छाप अंकित कर देती है कि वे बहुत समय तक स्मरण रहती हैं।

३. पुन:स्मरण (recall) :

स्मृति की तीसरी प्रक्रिया है पुनः स्मरण। इसका अर्थ है सीखी हुई बात को अचेतन मन से चेतन मन में लाना। जो बात जितना अच्छी तरह धरण की गई है। उतनी ही सरलता से उसका पूर्ण स्मरण होता है पर ऐसा सदैव नहीं होता है। भय चिंता शीघ्रता परेशानी आदि पुण्य स्मरण में बांध उपस्थित करते हैं। बालक भय के कारण भली-भांति स्मरण पाठ को अच्छी तरह नहीं सुना पाता है तथा जल्दी में हम बहुत से काम को करना भी भूल जाते हैं

४. अभिज्ञान/पहचान (recognition) :

स्मृति का चौथा अंग है अभिज्ञान या पहचान। इसका अर्थ है फिर याद आने वाली बात में किसी प्रकार की गलती ना करना। जैसे हम 5 वर्ष पूर्व दिल्ली में किसी व्यक्ति से मिले थे। उन्हें पुनः मिलने से ठीक-ठाक पहचानना या स्मरण करना कि अभिज्ञान या पहचान है। हम उससे कब कहां और क्यों मिले थे आदि।


स्मृति के प्रकार(types of memory), smriti ke prakar ka varnan karen(human memory) :

धारण क्षमता के आधार पर स्मृति को तीन भागों में बांटा जा सकता है जो इस प्रकार है स्मृति के मुख्य तीन प्रकार होते हैं-
१. सांवेदिक स्मृति(sensory memory)
२. अल्पकालिक स्मृति(short-term memory)
३. दीर्घकालिक स्मृति(long-term memory)

१. सांवेदिक स्मृति(sensory memory):

वैसी स्मृति संचय को कहा जाता है जिसमें सूचनाओं को सामान्यतः 1 सेकंड या उससे कम अवधि के लिए व्यक्ति स्मरण रख पाता है। इस स्मृति में प्राप्त सूचनाओं को उनके मौलिक रूप में अर्थात् उसमें बिना किसी तरह के फेरबदल किए हैं बिना ही रखा जाता है। सांवेदिक स्मृति को सांवेदिक संचयन या संवेदी रजिस्टर भी कहा जाता है।

२. अल्पकालिक स्मृति(short-term memory):

जैसा कि नाम से स्पष्ट है अल्पकालिक स्मृति में सूचना अत्यंत सीमित समय के लिए मंडराती रहती है। इस भंडार में वह सूचना रहती है जो वर्तमान काल की है। तथा तत्कालिक रूप से ग्रहण की गई है। इसके लिए कुछ अन्य नामों का प्रयोग भी किया जाता है जैसे कार्यकारी स्मृति, सक्रिय स्मृति, तत्कालिक स्मृति एवं प्राथमिक स्मृति आदि।
        अल्पकालिक स्मृति में सूचनाओं का भंडार 30 सेकंड से 1 या 2 मिनट तक हो सकता है।
      तत्पश्चात सूचनाएं विस्मृति हो जाती है।

३. दीर्घकालिक स्मृति(long-term memory):

यदि कोई छात्र यह बता सके कि पिछले दिन कक्षा में उसे क्या पढ़ाया गया। वयस्क व्यक्ति यह बताता है कि प्राथमिक कक्षा में उसके विज्ञान के शिक्षक का क्या नाम था? या कक्षा की पहली पाठ का ऐसा क्या था?
     स्पष्ट है कि इन तीनों दशाओं में वह अपनी दीर्घकालिक स्मृति का उपयोग कर रहा है। इस प्रकार दीर्घकालिक स्मृति किसी सूचना अथवा अनुभव की घटना का पुनः स्मरण है। जो स्मृति गत होने अथवा सीख लेने के बाद कई मिनट कई घंटों कई दिनों अथवा कई वर्षों के बाद होता है।


स्मृति को प्रभावित करने वाले कारक(factors affecting memory)(human memory)

१. शारीरिक दशा:

व्यक्ति की स्मृति को उनकी शारीरिक दशा प्रभावित करती हैं। शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं रहने पर उनके मस्तिष्क पर उसका प्रभाव पड़ता है और वह स्वस्थ व्यक्ति की तुलना में कम स्मरण कर पाता है।

२. अधिगम की मात्रा:

यह प्रमाणित है कि लंबे सामग्री को पढ़ने के अतिरिक्त उसे धारण करने में भी कठिनाई उत्पन्न होती है। कार्य की मात्रा के अनुसार समय तथा परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है। छोटे कार्य में कम समय तथा कम परिश्रम के कारण सही रूप से तथा अधिक समय तक धारण किया जा सकता है।

३. सामग्री की सार्थकता:

निरर्थक सामग्री की अपेक्षा सार्थक सामग्री अधिक समय तक स्मृति पटेल पर बनी रहती है। अतः सार्थक सामग्री शक्ति की स्मृति को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करती है।

४. अभ्यास:

सीखी गई वस्तु का बार-बार अभ्यास या दैनिक जीवन में प्रयोग नहीं होने पर उसका धीरे धीरे विस्मृति होने लगता है। अभ्यास के द्वारा अधिगम प्रक्रिया सरल बनते हैं। वे अभ्यास के अभाव में निर्बल हो जाते हैं।

५. समय अवधि:

यह प्राचीन विचारधारा है कि अधिगम के बाद जितना समय अंतराल हो जाता है। उतना ही तथ्य या घटनाओं का विस्मरण भी होने लगता है। अतः समय अंतराल स्मरण की क्षमता को प्रभावित करते हैं।

६. संवेगात्मक अवस्थाएं:

संवेगात्मक दशा में व्यक्ति की चिंतन प्रक्रिया प्रभावित होती है जिससे तथ्यों एवं घटनाओं का विस्मरण होने लगता है। भय क्रोध एवं आक्रमण की अवस्थाओं में सीखी गई सामग्री की धारण सही रूप से नहीं हो पाती।

७. मानसिक तत्परता:

मानसिक तत्परता पर व्यक्ति की रूचि तथा आदत का प्रभाव होता है। तत्परता पूर्वक सीखी गई सामग्री की धारण तथा पुनः स्मरण अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होती है। अतः मानसिक तत्परता व्यक्ति की स्मृति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।

८. अभिप्रेरणा :

जब व्यक्ति किसी सीखी हुई बात या अनुभव को याद रखने के लिए अभिप्रेरित होता है। दूसरे शब्दों में जब किसी अनुभव प्रशिक्षण या घटनाक्रम को स्मरण रखना व्यक्ति की जरूरत होती है तब उसकी स्मृति भी अधिक होती है। इसके विपरीत विस्मरण का होना पाया जाता है।

९. मानसिक मानसिक:

मानसिक व्याधियां भी सीखी हमें सामग्री के धारण करने में अवरोधन उत्पन्न करती है। अतः स्मृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

१०. अधिगम की विधियां:

अधिगम की विभिन्न विधियां जैसे अंशपूर्ण विधि, सक्रिय निष्क्रिया विधि आदि का प्रभाव भी स्मरण पर पड़ता है। विषय तथा सामग्री के आधार पर उचित विधि का प्रयोग कर स्मरण को बढ़ाया जा सकता है।


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व्यक्तिगत विभिन्नता के आधार पर यह माना जाता है कि स्मृति एक जन्मजात कौन है लेकिन प्रयोगों के द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि प्रशिक्षण और अभ्यास द्वारा ही इसका विकास किया जा सकता है। अतः एक शिक्षक तथा विद्यालय प्रशासन बालकों के स्मृति का विकास करने के साथ-साथ उनकी स्मृति क्षमता के अनुसार शिक्षण प्रबंध कर सकता है इसके लिए निम्न बिंदुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जो इस प्रकार हैं-

१. रूचि पूर्ण शिक्षण:

 रूचि पूर्ण रूप से दिया गया तथा प्राप्त किया गया ज्ञान छात्रों के द्वारा बार-बार प्रयोग किया जाता है जिसे व उसके दीर्घकालिक स्मृति का हिस्सा बन जाता है।

२. दृढ़ इच्छा शक्ति :

शिक्षक को बालकों में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने या विषय सामग्री को आत्मसात करने की दृढ इच्छाशक्ति का विकास करनी चाहिए जिससे की अध्ययन की गई सामग्री का विस्मरण न हो सके।

३. एकाग्रता/एकाग्र चित्त : 

शिक्षक तथा विद्यालय प्रशासन द्वारा इस बात का पूर्ण ध्यान दिया जाना चाहिए की बालक अपने पाठ्य सामग्री को एकाग्र चित्त होकर अध्ययन करें क्योंकि एकाग्रता ही स्मृति की वृद्धि करती है।

४. प्रोत्साहन:

बालक को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि उनकी स्मृति क्षमता बहुत अच्छी है तथा उन्हें और अच्छी विधियों को प्रयोग करने को कहना चाहिए।

५. पूर्व ज्ञान से संबंधित शिक्षा:

छात्रों को जो भी नवीन ज्ञान दिया जाता है उसे उनके पूर्व ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए जिससे की उनकी स्मृति में खंड पैदा ना हो।

६. दुहराना:

बालकों को जो पाठ पढ़ाया जा चुका है उसे स्मृति में बने रहने के लिए एक निश्चित समय अंतराल में दुहराया जाना चाहिए।

७. सार्थक अधिगम:

कक्षा में छात्रों को यदि विषय सामग्री का व्यापक तथा सार्थक अधिगम कराया जाता है तो छात्र उसे पूर्णतः आत्मसात करते हैं और वह स्थायी स्मृति में परिवर्तित हो जाता है।

८. स्मरण के अधिक अवसर प्रदान करना:

शिक्षक द्वारा छात्रों को अधिगमित विषय सामग्री या अनुभवों को पुनः याद करने के अवसर बार-बार प्रदान करना चाहिए। जिससे की उनका मस्तिष्क सक्रीय दशा में रहे तथा उनकी स्मृति का ह्रास न हो सके।

९. संवेगात्मक स्थिरता:

भय,क्रोध या अत्याधिक प्रेम या लगाव की दशा में अधिगमित की गई सामग्री या इन दशाओं को अनुभव किए गए अनुभूति के शीघ्र ह्रास होने की संभावना होती है। अतः बालक को इन दवाओं में पाठ याद करने या अध्ययन करने से रोकना चाहिए।

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