अधिगम की प्रभावशाली विधियां effective methods of learning

अधिगम की प्रभावशाली विधियां effective methods of learning

अधिगम की प्रभावशाली विधियाँ। adhigam ki prabhavshali vidhiyan । effective methods of learning in hindi

हेल्लो दोस्तों आज हम hindikeguru.com पर अधिगम की प्रभावशाली विधियां के बारे में पढ़ेंगे। वैसे तो अधिगम का मतलब होता है सीखना। जिसे अंग्रेजी में learning कहा जाता है। हर मनुष्य हर क्षण कुछ न कुछ सीखते ही रहता है चाहे वह खेलते वक्त हो, चाहे वह कहीं जा रहा हो, या किसी से बात कर रहा हो। अधिगम की प्रभावशाली विधियां या सीखने की प्रभावशाली विधियां निम्नलिखित है-

१. करके सीखना (learning by doing)

२. अनुकरण द्वारा सीखना (Learning by imitation) 

३. निरीक्षण करके सीखना (learning by observation)

४. परीक्षण करके सीखना (learning by experimentation)

५. पूर्ण एवं आंशिक विधि से सीखना (learning by whole and Part method

६. अविराम एवं विराम विधि (learning by massed and spaced method)

७. सामूहिक विधियों से सीखना (learning by group method)

     i. विचार विमर्श विधि (discussion method)

    ii. सम्मेलन व विचार गोष्ठी विधि (conference and seminar method)

    iii. कार्यशाला विधि (workshop method)

    iv. परियोजना विधि (project method)

    v. खेल विधि (Play way method)


 Read: अधिगम की परिभाषा अर्थ प्रकार एवं विधियां


१. करके सीखना (learning by doing) :

करके सीखना (learning by doing) अधिगम की सबसे अधिक प्रभावशाली विधि है करके सीखने में बालक खुद कार्य करके सीखते हैं और स्वयं ही उद्देश्य का निर्माण भी करते हैं तथा स्वयं योजना बनाते हैं और उस योजना को पूरा करने के लिए उसे विभिन्न तरह से करने का प्रयास करते हैं। करके सीखने कि इस विधि के द्वारा बालक स्वयं अपने आप का मूल्यांकन कर सकता है और जो कमियां रह जाती है उन कमियों को वह समझ कर पहचान कर स्वयं दूर करने का प्रयास भी करता है या उन कमियों को सुधारने का कोशिश करता है। कोई भी कार्य को स्वयं से करने पर उस कार्य का प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क पर सीधा पड़ता है जिस कारण से उस विषय को बालक या व्यक्ति लंबे समय तक याद रख सकते हैं। हर मनुष्य अपने बुद्धि से नहीं बल्कि करके सीखते हैं। 

उदाहरण के रूप में: स्कूल में कोई भी कार्यक्रम या साहित्यिक या सांस्कृतिक प्रोग्राम होता है तो शिक्षक बालक को उन कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए कहता है ताकि बालक स्वयं से करके जो भी कमी हो या जो भी बाधाएं हैं उन्हें समझ सके और आने वाले समय में दुबारा वही गलती ना करें इसलिए स्कूल या कॉलेजों में बालकों को किसी भी प्रोग्राम के लिए आगे लाया जाता है।


२. अनुकरण द्वारा सीखना (Learning by imitation) :

बालक जब छोटा होता है तो वह अपनी मां से अनुकरण द्वारा सीखता है मां जैसे-जैसे बोलती है या करने को कहती है बालक वैसे ही करता है। अनुकरण का अर्थ होता है किसी भी कार्य को उसी रूप में करना या फिर दोहराना। हर मनुष्य में अनुकरण या नकल करने की अपनी-अपनी प्रवृतियां होती है किसी व्यक्ति के हु-ब-हू आवाज निकाल लेता है तो किसी व्यक्ति के लिखी हुई चीजों को उसी रूप में लिख देता है। अनुकरण विधि बालको, कम शिक्षित व्यक्तियों, कम बुद्धि प्राणी, प्रखर बुद्धि के व्यक्तियों आदि पर अधिक प्रभावशाली है। चारित्रिक एवं नैतिक शिक्षा के लिए भी अनुकरण द्वारा सीखना अधिक उपयुक्त है क्योंकि जिस परिवार का सदस्य जैसे होंगे बालक भी उन्हें देखकर वैसे ही अनुकरण करते हैं और सीखते हैं इसलिए परिवार का भी या अपने आस-पड़ोस का भी बालक पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
उदाहरण के रूप में: बालक को पहाड़ा याद कराने के लिए शिक्षक पहले पहाड़ा पढ़ते है फिर बच्चे या बालक शिक्षक के पीछे-पीछे उन पहाड़ा का अनुकरण करते हैं या प्री प्राइमरी कक्षाओं में बालक के कॉपी में शिक्षक वर्ण लिखते हैं और बच्चे उन्हें देखकर उसी रूप में लिखते हैं इसी को अनुकरण कहा जाता है।


३. निरीक्षण करके सीखना (learning by observation) :

अधिगम की प्रभावशाली विधियों में निरीक्षण करके सीखना भी एक महत्वपूर्ण विधि है। जिसमें बालक जिस भी कार्य को करता है वह कार्य उसके समक्ष होती है बालक जिन वस्तुओं पदार्थो स्थानों आदि का निरीक्षण करते हैं उनके विषय में बालक बहुत जल्दी सीखते हैं और यह सीखना स्थायी भी होता है। यह विधि सबसे सरल विधि होती है क्योंकि इसमें मौखिक वर्णन के स्थान पर प्रत्यक्ष देखकर सीखा जाता है। किसी भी वस्तु का निरीक्षण करते वक्त बालक के सामने वह वस्तु या पदार्थ या स्थान या घटना उनके सामने ही होती हैं। जिसे बालक देखते हैं उसे छूते हैं यह उस पर प्रयोग करते हैं उसके विषय में बातचीत करते हैं जिसके द्वारा बालक बहुत जल्दी सीख जाते हैं क्योंकि कोई भी वस्तु या पदार्थ को देखे बिना या कल्पना के माध्यम से सीखने में बहुत समय लगता है पर वही वस्तु या पदार्थ बच्चों के सामने रख दिया जाए तो उसे देखकर बालक बहुत जल्दी समझ जाते हैं और सीखते भी हैं क्योंकि ऐसा करने से बालक इसमें एक से अधिक इंद्रियों का प्रयोग करते हैं जिससे वहा सीखा हुआ ज्ञान लंबे समय तक अपने मस्तिष्क में रखता है।
जैसे: फिजिक्सस, केमिस्ट्री या e.v.s जैसे विषयों में प्रैक्टिकल कराया जाता है तथा बच्चों को समय-समय पर भ्रमण के लिए ले जाया जाता है इतिहास या भूगोल के विषय पढ़ने वालों के लिए समय-समय पर निरीक्षण के लिए ले जाया जाता है ताकि वे उन्हें देखकर समझ सके और उनसे सीख सकें।

४. परीक्षण करके सीखना (learning by experimentation) :

मनुष्य में किसी भी वस्तु को सोचने-विचारने की शक्ति होती है। कुछ विचारों का एक निश्चित आधार होता है तो कुछ विचार काल्पनिक होती है काल्पनिक विचारों का वास्तविक आधार खोजने के लिए काल्पनिक विचारों को सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है उसी को परीक्षण कहा जाता है। जैसे गर्मी में ठोस तथा तरल पदार्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है। चावल की खेती में अधिक वर्षा होने पर क्या प्रभाव पड़ता है या फसल पर किसी भी रासायनिक पदार्थों का क्या क्या प्रभाव पड़ता है इन सभी का परीक्षण करना ही परीक्षण करके सीखना कहलाता है।
उदाहरण के लिए:
विज्ञान विषयों के बालकों को साइंस लैब में लेकर विभिन्न प्रकार के परीक्षण कराया जाता है तथा उन से बनने वाले रासायनिक पदार्थों का परीक्षण किया जाता है। 

५. पूर्ण एवं आंशिक विधि से सीखना (learning by whole and Part method) :

किसी भी विषय को दो तरह से सीखा जा सकता है पहला पूर्ण विधि और दूसरा आंशिक विधि से। किसी भी विषय के पाठ या चैप्टर को हम एक बार में ही पढ़ लेते हैं तो उसे हैं पूर्ण विधि कहा जाता है। लेकिन उसी पाठ को हम कई टुकड़ों में या छोटे-छोटे अंशों में पढ़ते हैं तो उसे आंशिक विधि द्वारा सीखना कहा जाता है। आंशिक विधि के द्वारा हम सबसे पहले एक भाग को सीखते हैं या पढ़ते हैं फिर दूसरे भाग को पढ़ते हैं या सीखते हैं यह सबसे उपयोगी विधि है क्योंकि थोड़े-थोड़े करके पढ़ना और सीखना बहुत ही आसान होता है लेकिन किसी भी चीज को एक बार ही में पढ़कर समझना या सीखना बहुत ही मुश्किल होता है। इन दोनों ही विधियों के लिए सीखने वालों की आयु, विषय वस्तु की लंबाई, अभ्यास और सीखने वालों की योग्यता पर निर्भर करता है। उच्च कक्षाओं के लिए छोटी विषय वस्तु के लिए तीव्र बुद्धि के व्यक्तियों के लिए पूर्ण विधि अधिक उपयोगी होती है लेकिन बच्चों के लिए लंबे विषय वस्तु के लिए और कम बुद्धि के व्यक्तियों के लिए आंशिक विधि से सीखना बहुत ही सुविधाजनक होता है।

६. अविराम एवं विराम विधि (learning by massed and spaced method) :

किसी भी कार्य को सीखने के लिए हम लगातार उस कार्य को करने का प्रयास करते हैं तो उसे अविराम विधि कहते हैं और जब यह प्रयास लगातार ना होकर बीच-बीच में थोड़ा विश्राम लेते हैं या थोड़ा-थोड़ा करके किसी भी कार्य को सीखते हैं तो उसे विराम विधि कहा जाता है। विराम विधि अभिराम विधि के अपेक्षा अधिक उपयोगी है क्योंकि विराम विधि से सीखने में थकावट का अनुभव नहीं होता, बालक की अभिरुचि बनी रहती हैं सीखने में जो बीच बीच में विश्राम या विराम लिया जाता है उससे बाला के स्मृति को सूजी बनाने का अच्छा अवसर मिल जाता है जिससे उनके मस्तिष्क पूर्ण रूप से चलने लगती है जिससे वे आगे सीखने में गतिशील होती है। लेकिन किसी भी कार्य या विषय को जिसे सीखा जा सके अगर वह छोटा या हल्का हो तो उसे अब इरम विधि के द्वारा ही करना चाहिए।

७. सामूहिक विधियों से सीखना (learning by group method)

सामूहिक विधि द्वारा सीखना व्यक्तिगत विधि द्वारा सीखने से कई गुना अच्छा है क्योंकि सामूहिक विधि में हर एक व्यक्ति की स्मृति या मस्तिष्क उस कार्य को करने में जुड़ा होता है जिससे लोगों के भिन्न-भिन्न धारणाएं उसमें जागृत होती है तथा व्यक्तिगत विधि द्वारा सीखना केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित रह जाती है जिसके कारण उनके मस्तिष्क में केवल और केवल स्वयं का प्रभाव पड़ता है। इन दोनों प्रकार की विधियों में सामूहिक विधि को अधिक प्रभावशाली माना जाता है।
प्रमुख सामूहिक विधियां निम्न प्रकार से हैं-

     i. विचार विमर्श विधि (discussion method)

विचार विमर्श अधिगम की एक ऐसी विधि है जिसमें विद्यार्थी किसी भी पाठ या समस्या पर आपसी विचार विमर्श करते हुए एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। विचार-विमर्श विधि वाद-विवाद विधि से बिल्कुल अलग है क्योंकि इसमें भाग लेने वाले विद्यार्थी किसी मूल स्रोत की खोज करते हैं जबकि वाद विवाद में वह सत्य को खोजने का प्रयास करने की अपेक्षा उस विषय पर या उस समस्या पर बहस के द्वारा अपने पक्ष को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करते हैं। विचार विमर्श में विद्यार्थी अधिक सक्रिय रहते हैं और शिक्षक उनको उनकी आवश्यकता अनुसार निर्देश भी देते हैं।

    ii. सम्मेलन व विचार गोष्ठी विधि (conference and seminar method)

सम्मेलन व विचार गोष्ठी एक समूह के सदस्यों के मध्य तार्किक एवं ज्ञानवर्ध्दक वातावरण में आपसी विचार-विमर्श है। सम्मेलन व विचार गोष्ठी में समूह के सभी सदस्यों को अपने विचार प्रकट करने का अवसर मिलता है। इस विधि के द्वारा समूह के सदस्य किसी विशिष्ट और महत्वपूर्ण समस्या पर विचार करके किसी समुचित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। सम्मेलन और विचार गोष्ठी मैं चौकी विद्यार्थियों को अधिक सोचने और समझने का अवसर मिल जाता है तथा इनके द्वारा प्राप्त ज्ञान अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली होता है जिसके कारण विद्यार्थियों की रुचि बनी रहती है और इन के माध्यम से सीख आज्ञा ज्ञान स्थायी रहता है।

    iii. कार्यशाला विधि (workshop method)

यह सीखने की एक ऐसी विधि है जिसमें विद्यार्थी न केवल विचार विमर्श करते हैं बल्कि सामूहिक रूप से रचनात्मक कार्य भी करते हैं। कार्यशाला विधि किसी भी विषय या समस्या या कार्य पर सामूहिक रूप से विचार कर उसका समाधान खोजने का प्रयास किया जाता है तथा उस पर विचार विमर्श किया जाता है जिससे उसके प्रति सैद्धांतिक पक्ष स्पष्ट हो जाती है जिसके कारण उस समस्या का समाधान हो जाता है। साथ ही उस में भाग लेने वाले प्रतिभागियों द्वारा सामूहिक कार्य किया जाता है कार्यशाला विधि में विद्यार्थियों को स्वयं कार्य करने का मौका मिलता है जिससे उन में उन कार्य को करें तथा समस्या को समाधान करने की रूचि उत्पन्न होती है और उस कार्य को कर  समस्या का समाधान कर अधिगम को बढ़ाते हैं।

    iv. परियोजना विधि (project method)

परियोजना विधि अनुभव केंद्रित विधि है क्योंकि इस विधि में किसी समस्या को विद्यार्थी के सामने रखा जाता है और वे उस कार्य का या उस समस्या का हल निकालते हैं इसके लिए सूचनाएं एकत्रित की जाती है। विद्यार्थी विषय वस्तु से संबंधित सामग्री का अध्ययन करते हैं, विभिन्न आंकड़ों का संग्रह करते हैं तथा उनका विश्लेषण करते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं इस विधि को सामूहिक रूप में कार्य करने के कारण विद्यार्थी में सहयोग सहानुभूति तथा सामाजिक गुणों का विकास होता है तथा इस विधि द्वारा सीखी गई ज्ञान स्थायी होता है।

    v. खेल विधि (Play way method)

 बालक या विद्यार्थी सभी खेल में रुचि लेते हैं या बालक की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है बालक खेल विधि द्वारा जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान चुटकियों में निकाल लेता है जिसके कारण उनमें अधिगम की शीघ्रता रुचि कार एवं प्रभावशाली और स्थायी प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्ष

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि अधिगम की प्रभावशाली विधियां(adhigam ki prabhavshali vidhiyan । effective methods of learning in hindi) व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण है व्यक्ति जिस कार्य को सीखने में ज्यादा समय लगाता है उसी कार्य को वे सामूहिक रूप में बहुत ही जल्दी कर लेता है इसलिए उचित है कि व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार या कार्य के अनुसार सामूहिक या व्यक्तिगत विधियों का प्रयोग करना चाहिए व्यक्ति का स्वाभाविक ही है कि वे करके, अनुकरण द्वारा, निरीक्षण परीक्षण द्वारा सीखता है यह हर मनुष्य की विशेषता है।

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