प्रयोजनमूलक हिंदी की अवधारणा एवं दिशाएं (prayojanmulak hindi ki avdharna aur dishayen)

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प्रयोजनमूलक हिन्दी की अवधारणा (prayojanmulak hindi ki avdharna:

भाषा एक सामाजिक यथार्थ है इसका विकास मानव के सामाजिक जीवन के विभिन्न प्रयोजनों के संप्रेषण के लिए हुआ हैं । यह सामान्य सम्प्रेषण नहीं होता वरन दैनिक जीवन के विभिन्न प्रयोजनों को साधने के लिए होता है । सामाजिक जीवन में इन विभिन्न संदर्भों  स्थितियों और कार्य क्षेत्रों में भाषा का प्रयोग होने से  उसके कई  रूप उभरने लगते हैं। वस्तुतः भाषा अपने आप में समरूपी होती हैजगते है परंतु प्रयोग में आने से वह  विषमरूपी बन जाती है इन्हीं प्रयोगगत भेदों के कारण कई भाषा भेद दिखाई देते हैं इसका कारण यह भी  है कि मनुष्य का मस्तिष्ठ इतना सृजनशील होता है कि विभिन्न स्थितियों संदर्भों और उद्देश्यों के अनुरूप वह भिन्न-भिन्न भाषा शैलियों का उपयोग करता है और ये शैलियां सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रयोजन परक संदर्भों में नियंत्रित होती है।

       किसी संदर्भ में भाषा के दो मुख्य पक्ष हमारे सामने आते हैं एक का संबंध मानव की सौंदर्य परक अनुभूतियों से होता है और दूसरा पक्ष भाषा के प्रयोजन परक आयामों से जुड़ा रहता है।


१. भाषा का सौंदर्य पर एक आयाम भी भाषा रचनात्मक होती है जिसका विकास साहित्य की भाषा के रूप में होता है या भाषा कविता कहानी उपन्यास और नाटक आदि विभिन्न साहित्यिक विधाओं में निखर कर आती है। इस भाषा में देश अथवा प्रांत के सामाजिक सांस्कृतिक मूल्य निहित होते हैं।


२. भाषा के दूसरे पक्ष का संबंध हमारी सामाजिक आवश्यकताओं और जीवन की उस व्यवस्था से होता है जो व्यक्ति से लेकर समाज सापेक्ष होता है या भाषा का कार्यात्मक आयाम है जिसका प्रयोग किसी प्रयोजन विशेष या कार्य विशेष के संदर्भ में होता है।

         हिंदी भाषा के लिए प्रयोजनमूलक शब्द की अवधारणा अंग्रेजी के 2 शब्द दो फंक्शनल अथवा Applied से अभिप्रेरित है। फंक्शनल का तात्पर्य है कार्यात्मक क्रियाशील अथवा वृत्तिमूलक जबकि Applied का अर्थ है अनुप्रयुक्त अथवा प्रयोगिक अथवा व्यवहारिक। प्रयोजनमूलक हिंदी के लिए ये सारे अर्थ सर्वथा उपयुक्त हैं अतः प्रयोजनमूलक हिंदी से तात्पर्य हुआ किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयोग में आने वाली हिंदी दूसरे शब्दों में प्रयोजनमूलक हिंदी भाषा को किस तरह से स्पष्ट किया जा सकता है- विशिष्ट परियोजनाओं में विशिष्ट वर्ग द्वारा और विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली विशिष्ट भाषा प्रयोजनमूलक भाषा है। इसमें विषय का प्रतिपादन एवं निर्धारण होता है। इस विशिष्ट भाषा में अपने अपने विषय की शब्दावली और अपनी विशेष संरचना होती है जो इसे विशेष रूप प्रदान करती हैं चिकित्सा अभियंत्रण विज्ञान अंतरिक्ष ज्योतिष तथा इसी तरह विविध क्षेत्रों की भाषा के लिए विशिष्ट शब्दावली होती है जो विषय के अर्थ और आशय को स्पष्ट करने में सहायक होती है। वास्तव में सामान्य भाषा और विशिष्ट भाषा एक ही होती है किंतु शब्दावली और संरचना की दृष्टि से दोनों का अंतर अर्थ प्रयोजन को स्पष्ट करता है जिससे प्रयोजनमूलक भाषा को एक स्वरूप मिलता है क्षेत्र अथवा विषय विशेष के लिए प्रयुक्त भाषा अर्थात् प्रयोजनमूलक भाषा के शब्दों का एक मानक अर्थ सुनिश्चित होता है। जिसमें एकरूपता और शब्द प्रयोग का औचित्य नीहित रहता है।


प्रयोजनमूलक हिंदी की विविध दिशाएं:-

हिंदी खड़ी बोली का मानक रूप है और ज्ञापक अर्थ से अपनी सीमा को पारकर सभी क्षेत्रों की भाषा बन गई है। यह केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों तक सीमित न रहकर सर्वदेशिक भाषा बन गई है इसमें अपनी बोली ओ के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओं अंग्रेजी और उर्दू फारसी के बाद बड़ी संख्या में समाविष्ट हो गए हैं। हिंदी का प्रयोग विभिन्न कार्य क्षेत्रों में होने लगा इस प्रकार हिंदी भाषा का शब्द भंडार विभिन्न भाषाओं के प्रभाव को ग्रहण करते हुए अनेक नए शब्दों को अपनाते हुए समृद्ध होता जा रहा है इसका विस्तार अनेक नई दिशाओं में हो रहा है। प्रयोजनमूलक हिंदी की दिशाओं को निम्नलिखित प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है।

१. भौगोलिक दिशा:-

भौगोलिक अर्थ में हिंदी भाषा भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली हिंदी की विभिन्न गोलियों के रूप में प्रयोग की जाती हैं। ये बोलियां है- खड़ी बोली, ब्रजभाषा, अवधि, भोजपुरी, हरियाणवी, कन्नौजी मैथिली बघेली छत्तीसगढ़ी मगही मालवी गढ़वाली हुंमापूनी और हिमाचली इसके अतिरिक्त भाषा शैली के आधार पर भी विभिन्न प्रदेशों और क्षेत्रों में उपयोग होने वाली हिंदी भाषा पर उस क्षेत्र विशेष का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। हिंदी के कुछ विद्वानों ने हिंदी की बोलियों को 5 भाषाओं के अंतर्गत रखा है।
i. पश्चिमी हिंदी
ii. राजस्थानी
iii. बिहारी
iv. पूर्वी हिंदी
v. पहाड़ी हिंदी
उल्लेखनीय है कि 1850 के पहले सिंधी पंजाबी और मुल्तानी को हिंदी की बोलियां माना जाता था। 1947 से पहले नेपाली भाषा भी हिंदी की बोली के रूप में मानी जाती है कि भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर हिंदी भाषा में जिस तरह की प्रयुक्तियां उपयोग की जाती है वे प्रयोजनमूलक हिंदी को व्यापकता में वृद्धि करने में सहायक होती है-
     दक्षिण भारत में कल्याण से तात्पर्य है विवाह से।

२. साहित्यिक शैली:

हिंदी में होने वाले साहित्य सृजन की भाषा बोल-चाल में उपयोग होने वाली भाषा की तुलना में कहीं भिन्न होती है। साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा गद्य, पद्य, नाटक, निबंध, आलेख, व्यंग्य और उपन्यास आदि में जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया है। वह अपनी विधा को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है व्याकरण की दृष्टि से साहित्यिक भाषा शुद्ध होती है अर्थात् व्याकरण के नियमों का पालन करना साहित्यिक की भाषा की प्रयोजनीयता भी है और अनिवार्यता भी इसमें संस्कृत के मूल शब्दों का उपयोग भी सामान्य रूप से किया जा सकता है। इसके लिए लेखन के संदर्भ को ध्यान में रखा जाता है। प्राचीन काल में हिंदी भाषा में साहित्य सृजन करते समय तत्सम या संस्कृत के मूल शब्दों के प्रयोगों को प्राथमिकता दी जाती है बाद के समय में विभिन्न बोलियों के शब्दों का प्रयोग बहुतायत में होने लगा। वर्तमान संदर्भ में तद्भव शब्दों और बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले शब्दों के प्रयोग इस कारण बड़ा है कि ऐसे लेखन की पाठनीयता के क्षेत्र का विस्तार हो सके। आज की पीढ़ी इस भाषा को या जिस भाषा रूप को आसानी से समझ सकती हैं और बोलचाल में जिस प्रकार की भाषा का उपयोग करती है। पुस्तकों की भाषा और साहित्य सृजन की भाषा उसी तरह की होने की अपेक्षा उसे रहती है इसलिए लेखन कार्य जिस वर्ग को ध्यान में या केंद्र में रखकर किया जा रहा हो उसकी भाषा उसी वर्ग के अनुरूप और अनुकूल होने से उसकी पठनीयता बढ़ती है। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उपयोग होने वाली भाषा हिंदी के नए प्रयोजन और प्रयुक्ति यों का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

३. प्रयोग विस्तार की दिशा:-

इसके अंतर्गत उन सभी विषयों और क्षेत्रों को समेटा जा सकता है जिनके लिए विशेष शब्दों के उपयोग की आवश्यकता पड़ती है ये क्षेत्र है-
i. कार्यालयी भाषा:-
कार्यालयों या ऑफिस आदि  में उपयोग होने वाली विशिष्ट औपचारिक भाषा। जिनका प्रयोग केवल कार्यालय क्षेत्रों में ही किया जाता है।

ii. वृत्त वाणिज्य व्यापार की भाषा:
इस क्षेत्रों के अनुरूप शब्दावली तेजी, उछला, भड़का जैसे शब्दों का प्रयोग वृत्त वाणिज्य व्यापार आदि क्षेत्रों में किया जाता है जैसे:
मिर्च में तेजी।
सोना उछला।
जीरा भड़का।

iii. दूरसंचार की भाषा:
शब्दों के नए रूप तथा तकनीकी शब्द दोनों ही आते हैं-रेडियो टेलीविजन अखबार इत्यादि।

iv. विधि एवं कानून:
वारंट जारी या सूचना देने के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है धारा, जमानत, हवालात, करवाई, खारिज, फैसला, गवाही।

v. विज्ञान:
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य शब्द का प्रयोग जैसे ऑक्सीजन हाइड्रोजन मीटर पोटेशियम आदि।

vi. तकनीक क्षेत्र:
हर चित्र विषय या विषय की अपनी अलग भाषा होती है जो केवल उसी क्षेत्र में प्रयोग होता है ज्योतिष अंतरिक्ष ।


प्रयोजनमूलक हिंदी की प्रासंगिकता

भाषा के दो पक्ष होते हैं एक का संबंध उसकी संरचना अथवा बनावट के साथ होता है और दूसरे का संबंध उसके प्रयोजन का संदर्भ उसका संप्रेषण होता है। यद्यपि संरचना और प्रयोजन का अटूट संबंध है तथापि भाषा के संरचनात्मक पक्ष की तुलना में प्रयोजनमूलक पक्ष का महत्व व्यवहार और प्रवाह की दृष्टि से कहीं अधिक है। पाली प्राकृत एवं संस्कृत भाषाओं की तरह यदि हिंदी भाषा भी अपनी संरचनात्मक एवं व्याकरणिक शुद्धता की सीमा से बंधी रह गई होती तो आज उसकी प्रासंगिकता भी समाप्त हो चुकी होती। हिंदी भाषा एक नया प्रयुक्ति परख रूप प्रयोजनमूलक हिंदी के रूप में हमारे सामने है और इसी कारण आज हिंदी विकास की ऊंचाइयों पर है। प्रयोजनमूलक हिंदी भाषा विज्ञान की महत्वपूर्ण शाखा अनुप्रयुक्त (applied) भाषा विज्ञान के अंतर्गत विकसित एक अत्याधुनिक शाखा है। भाषागत वैशिष्ट्य प्रयोजनमूलक हिंदी को स्वतंत्र अस्मिता प्रदान करता है। प्रयोजनमूलक हिंदी विभिन्न भारतीय भाषाओं एवं विदेशी भाषाओं से अपनी शब्द संपादा में वृद्धि करती है। यह हिंदी साहित्यिक भाषा की तुलना में अधिक स्पष्ट सटीक गंभीर एवं एकार्थक होती है प्रयोजनमूलक हिंदी की प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं हो सकती क्योंकि अभिव्यक्ति एवं संप्रेषण की आवश्यकता के अनुसार यह भाषा अपने आप को परिवर्तित और परिवर्धित करने में पूर्ण तथा सक्षम है।

       प्रयोजनमूलक हिंदी की प्रासंगिकता को निम्नलिखित रूपों में स्पष्ट किया जा सकता है।

१. यह मातृ भाषा राजभाषा संपर्क भाषा और राष्ट्रीय भाषा के रूप में देश की एक बड़े आबादी द्वारा प्रयोग की जाती है।


२. विभिन्न भाषाओं के शब्दों के उपयोग के कारण यह हिंदी भाषियों के लिए सीखने और व्यवहार करने में आसान हैं।


३. विभिन्न कार्य क्षेत्रों के लोगों के लिए व्यवहारिक दृष्टि से अधिक सरल है।


४. प्रयोजनमूलक हिंदी में आवश्यकता और सुविधा के अनुसार शब्दों के उपयोग की छूट मिलती है।


५. मूल और विशुद्ध भाषा की अपेक्षा प्रयोजनमूलक हिंदी में लचीलापन अधिक है। जो प्रतिकूलताओं के बीच भी अपने अस्तित्व को बनाए रख सकती हैं।


६. प्रत्येक विषय क्षेत्र के लिए विशिष्ट शब्दावली है जो विषय की समझ के लिए आवश्यक है।


७. विशिष्ट अर्थ वाले शब्दों के लिए हिंदी में मानक शब्द गढ़े जा सकते हैं अथवा उन शब्दों को यथारूप उपयोग में लाया जा सकता है।


८. बोलने और समझने में सहज सरल और अभिव्यक्ति में सशक्त होने के कारण संपर्क भाषा के रूप में लोकप्रिय और प्रचलित हैं।


९. प्रयोजनमूलक हिंदी स्थानीयता और क्षेत्रीयता के प्रभाव को आसानी से आत्मसात कर सकती हैं।


१०. प्रयोग करते रहना इस भाषा की विशेषता है।


       समय के साथ स्वयं को बदलने और सुधारने में सक्षम रहने के कारण विश्व के कई भाषाएं आज अपना अस्तित्व खो चुकी है अथवा पुरातत्व और शोध का विषय बन कर रह गई है। प्रयोजन के अनुसार अपने आप को ढालने की विशेषता के कारण प्रयोजनमूलक हिंदी की प्रयोजनीयता एवं प्रासंगिकता भी हमेशा बनी रहेगी तथा हिंदी अपने प्रयोजनमूलक रूप में सदैव जीवंत बनी रहेगी।


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