जनभाषा क्या है, जनभाषा का स्वरूप ( janbhasha kya hain, janbhasha ka swaroop)

जनभाषा क्या है, जनभाषा का स्वरूप ( janbhasha kya hain, janbhasha ka swaroop)

 जनभाषा क्या है (janbhasha kya hain)

जनभाषा अथवा जनपदीय भाषा एक ऐसी भाषा है जो किसी विशेष क्षेत्र या प्रदेश के बीच अपने विचारों को आदान प्रदान के लिए किया जाता है। यह एक ऐसी भाषा है जिसमें कोई व्यक्ति अपने ही प्रदेश या क्षेत्र विशेष में दूसरे व्यक्ति से संपर्क करने का काम करता है उसी माध्यम को जनभाषा कहा‌ जाता है। यह भाषा शुद्ध नहीं होती और ना ही व्याकरणिक नियमों से बंधी होती है बस इन भाषाओं का प्रयोग एक क्षेत्र विशेष यानी जनभाषा के रूप में किया जाता है।

 

जनभाषा का स्वरूप (janbhasha ka swaroop)

जनभाषा अथवा जनपदीय भाषा के रूप में हिंदी अलग-अलग बोली बोलने वालों के लिए अपनी अलग पहचान रखने की सशक्त माध्यम है। हिंदी भाषी राज्यों में बोली जाने वाली बोलियां वस्तुतः उन राज्यों के लोगों द्वारा अपनी मातृभाषा के रूप में प्रयोग की जाती है। अन्य बोली बोलने वाले के साथ वे इसका प्रयोग प्रथम भाषा के रूप में करते हैं। प्रथम भाषा वह भाषा है जिसका व्यवहार व्यक्ति सबसे अच्छी तरह कर सकता है चाहे वह उसकी मात्रिभाषा ही क्यों ना हो। इस प्रकार हिंदी भाषी राज्यों में ब्रज अवधी भोजपुरी आदि बोलियों के बीच हिंदी अपने अस्तित्व को बनाए रखती है। हिंदी भाषा का प्रयोग हिंदी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है वरन पूरे भारत में इसका उपयोग होता है। हिंदी भाषा का क्षेत्र मुख्यत: बिहार झारखंड उत्तर प्रदेश हिमाचल प्रदेश हरियाणा राजस्थान मध्य प्रदेश एवं दिल्ली तक फैला हुआ है। इन हिंदी भाषा क्षेत्र कहते हैं। इन प्रदेशों की सीमाएं पश्चिम बंगाल उड़ीसा महाराष्ट्र गुजरात और पंजाब आदि राज्यों के साथ जुड़ी हुई है। यह महाराष्ट्र, गुजरात पंजाब अंडमान निकोबार और गोवा जैसे कई प्रदेशों में दूसरी भाषा के रूप में भी बोली जाती है। इसके अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग मैसूर हैदराबाद आदि दक्षिण के कई क्षेत्रों में भी होता है। जिसे दक्खिनी हिंदी कहते हैं। जनभाषा के रूप में हिंदी ना केवल अपने मूल और विशुद्ध रूप में व्यवहार की जाती है बल्कि विभिन्न बोलियों के माध्यम से भी इसे जन भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में बोली जाने वाली सभी बोलियों जैसे ब्रजभाषा अवधि भोजपुरी आदि को भी जन भाषा हिंदी का ही एक रूप माना जाता है। सन् 1850 के पहले पंजाबी भाषा को हिंदी की बोली माना जाता था। 1853 में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी नामक एक पत्रिका में प्रकाशित एक प्रमाणिक लेख के अनुसार सरकारी तौर पे सिंधी पंजाबी और मुल्तानी को हिंदी की बोलियों के रूप में प्रस्तुत किया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व अर्थात 1947 से पहले तक नेपाली भाषा को हिंदी की बोली कहा जाता था। बाद में संविधान द्वारा इसे भारतीय भाषा होने का दर्जा नहीं दिया गया।

हिंदी अपनी व्यापकता के कारण ही जन भाषा का स्थान अर्जित कर पाई है। सामान्य रूप से जन भाषा उस भाषा को कहा और माना जा सकता है जो सामान्य जन में ना केवल संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जाए बल्कि उस भाषा को अपनी भाषा मानते हुए अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार क्षेत्रीयता और स्थानीयता के अनुसार उसे ढाल लिया जाए। हिंदी भाषा का यही लचीलापन उसे जन भाषा बनाने की योग्य प्रदान करता है। एक बहुभाषीय राष्ट्र में एक राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करना राष्ट्र की एकता और संपर्क की सुगमता के लिए आवश्यक था और इसी कारण इसे अनिवार्य भी बनाया गया। परंतु अपनी सरलता बोधगम्यता और लचीलापन के कारण हिंदी स्वत: जन भाषा बन गई। विभिन्न बोलियों के रूप में हिंदी की शाखा प्रशाखाओं में हिंदी को एक विशाल और मजबूत ब्रिक्स बनाने में सहायता होती है।

Read More: भाषा का अर्थ एवं प्रकृति (bhasha ke kitne roop hote hain) II विज्ञापन क्या है ( advertisement), विज्ञापन के महत्व, विज्ञापन के उद्देश्य 

Leave a Comment