ईदगाह कहानी का सारांश (idgah kahani ka saransh)

आप सभी का इस आर्टिकल में स्वागत है आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से ईदगाह कहानी का सारांश (idgah kahani ka saransh) को पढ़ने जा रहे हैं। ईदगाह कहानी प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी है आए दिन इस कहानी का सारांश स्कूलों एवं कॉलेजों में पूछी जाती है जिसके कारण हम आपके लिए इस आर्टिकल के माध्यम से इस प्रश्न का उत्तर देने जा रहे हैं तो चलिए ईदगाह कहानी का सारांश (idgah kahani ka saransh) को देखें-
ईदगाह कहानी का सारांश (idgah kahani ka saransh)

ईदगाह कहानी का सारांश (idgah kahani ka saransh)


ईदगाह कहानी कथा सम्राट प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानी है। कहानी का आरम्भ ईदगाह के मेले में जाने की तैयारी के साथ शुरू होता है। ईदगाह का मेला एक माह के रोजे के बाद आयी ईद की खुशी में लगता है । गाँव में बड़े-बच्चे सभी ईदगाह के मेले में जाने की तैयारी में लगे है। बच्चे सबसे अधिक उत्साहित है। बच्चे अपने माता-पिता से जो पैसे पाये हैं उसे बार-बार गिनकर अपने पास रख लेते हैं। इन लड़को में एक छः वर्ष का लड़का हामिद भी है। इसके माता-पिता खुदा को प्यारे हो चुके है और उसका पालन-पोषण उसकी बूढ़ी-गरीब दादी अमीना करती है। अबोध हामिद को बताया गया है कि उसकी माँ अल्लाह मियाँ के यहाँ गयी है और अच्छी-अच्छी चीजें लेकर आयेगी। उसके अब्बाजान रुपये कमाने गये हैं। वे बहुत रुपये लेकर आयेंगे। हामिद मन से सोचता है कि जब उसके माँ और अब्बा आ जायेंगे तब वह अपने साथियों महमूद, नूरे, मोहसिन और सम्मी को देख लेगा । उसकी दादी को आज पर्व के दिन अपनी गरीबी खल रही है। ईद का दिन है और घर में एक दाना नहीं है। हामिद को अपनी दादी से तीन पैसे मिले हैं जिसे लेकर वह मेले में जाने के लिए उत्साहित है। सभी बच्चे अपने पिता के साथ मेले में जा रहे है और हामिद की दादी को चिन्ता है कि वह इस छोटी-सी जान को मेले में कैसे जाने दें ? कही खो गया तो ? तीन कोस पैदल यह छोटा बच्चा कैसे जायेगा, पर हामिद अपनी दादी से कहता है, 'तुम डरना नहीं अम्मा, मैं सबसे पहले आऊँगा । बिल्कुल न डरना।' बच्चे आपस में बातें करते मेले में जा रहे हैं, हामिद भी उनके साथ है । जिन्नात और उसकी शक्ति के बारे में सुनकर हामिद को विश्वास हो आता है कि उसके गाँव के चौधुरी के पास जिन्नात के कारण बहुत रुपये-पैसे है। इसी बीच पुलिस लाइन आने पर बच्चे पुलिस की करतूतों पर तर्क वितर्क करते हैं।

सहसा बच्चे ईदगाह के पास पहुँचते है जहाँ नमाज पढ़ने वालों की पंक्तियों दूर-दूर तक फैली है। ऐसा लगता है मानो भातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक सूत्र में पिरोये हुए है। नमाज समाप्त होने पर लोग एक दूसरे के गले मिलते है और बच्चे खिलौनो और मिठाइयों की दुकानों की ओर दौड़ पड़ते है। वे और अपनी-अपनी शक्ति अनुसार खिलौने मिठाइयाँ खरीदते हैं और हिंडोला आदि पर चढ़कर आनन्द लेते हैं। कहानी का नायक हामिद इन सबसे दूर खड़ा है क्योंकि उसके पास मात्र तीन पैसे हैं जिन्हें वह बेकार खर्च करना नहीं चाहता है। हामिद के साथी अपनी पसन्द का खिलौना खरीदते हैं। मोहसिन भिस्ती, नूरे वकील और महमूद सिपाही खरीदते है पर हामिद की अनुभवी आँखें कुछ और ढूंढ रही है। मोहसिन उससे रेवड़ी लेने को कहता है, पर जब हामिद उसके पास जाता है। तो वह रेवड़ी अपने मुँह मे डाल लेता है। हामिद का दिल कचोट कर रह जाता है।

हामिद लोहे का समान बिकने वाली दुकान पर जाता है और छः पैसे के चिमटे को मोल-भाव कर तीन पैसे में खरीद लेता है। मन ही मन उसे यह जानकर बहुत खुशी होती है कि चिमटे को देखकर उसकी बूढ़ी दादी बहुत खुश होगी । अब रोटी बनाते समय उसके हाथ नहीं जलेंगे। बच्चे जब आपस मे अपने खिलौने की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तो हामिद अपने तर्क बल पर चिमटे की श्रेष्ठता सिद्ध कर देता है और कहता है, "मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आंधी तूफान में बराबर डटकर खड़ा रहेगा।" उसके साथी उसकी बुद्धि के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।

लोग अब मेले से गाँव आ गये थे। सबके खिलौने देखते-देखते नष्ट हो गये। भिस्ती की टांग टूट गयी वकील साहब का मिट्टी का चोला मिट्टी में मिल गया। सिपाही की एक टांग भी टूट गयी । बचा केवल हामिद का चिमटा । हामिद जब घर पहुँचा तो उसके हाथ में चिमटा देखकर उसकी दादी ने कहा, "लाया क्या चिमटा ? सारे मेले में तुम्हे और कोई चीज न मिली जो यह चिमटा उठा लाया ।" हामिद ने अपराधी की तरह कहा, "तुम्हारी उंगलियाँ तवे से जल जाती थी इसलिए मैंने इसे लिया ।" बच्चे का अपने प्रति श्रद्धाभाव देखकर बूढ़ी अमीना की आँखें भर आयी और उसका रोम-रोम हामिद को दुआएं देने लगा।

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